भगवान शिव और दक्ष प्रजापति का मनोमालिन्य

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

श्रीमद्भागवत महापुराण के चतुर्थ स्कन्ध में सृष्टि के विस्तार और प्रजापतियों के वंश कि कथा आती है |प्रथम अध्याय में स्वायम्भुव मनु कि पुत्रियों का वर्णन और दक्ष प्रजापति द्वारा अपनी कन्याओं का विवाह करने का प्रसंग है | उसी प्रसंग में सूत्र रूप में कहा गया है कि दक्ष की सब से छोटी पुत्री सती ने अपने पिता द्वारा अपने पति शिव का अपमान देख कर अपने शरीर का त्याग कर दिया |यह सुन कर विदुर जी के मन में गहरा विस्मय उत्पन्न होता है | द्वितीय अध्याय उसी विस्मय के समाधान के रूप में अवतरित होता है |

विदुर जी का प्रश्न -शिव से द्वेष कैसे हुआ ?

विदुर जी मैत्रेय से प्रश्न करते हैं – ब्रह्मन प्रजापति तो अपनी पुत्रियों से अत्यंत स्नेह रखते थे,फिर उन्होंने अपनी ही पुत्री सती का अनादर कर के शीलवानों में श्रेष्ठ महादेव जी से द्वेष क्यों किया ? विदुर जी आगे कहते हैं : महादेव जी तो समस्त चराचर के गुरु हैं ,वैर रहित हैं ,शांत मूर्ती हैं ,आत्मा में ही रमन करने वाले आत्माराम हैं और जगत के परम आराध्य देव हैं | उन से भला कोई क्यों द्वेष करेगा? भगवन ,इन ससुर और दामाद में ऐसा क्या वैर उत्पन्न हुआ जिस के कारण सती जैसी साध्वी को अपने अत्यंत दुस्त्यज प्राणों का त्याग करना पड़ा ?कृपा करके यह कथा विस्तार से कहिये | यही इस अध्याय का मुख्य बीज है -सम्मान की भूख कैसे भक्ति को भी विषाक्त कर देती है |

प्रजापति का महान यज्ञ -सत्र

मैत्रेयजी उतर देते हैं -बहुत प्राचीन काल कि बात है |विश्व के सृजन करने वाले प्रजापतियों ने एक महान यज्ञ सत्र का आयोजन किया था |यह सत्र एक हजार वर्षों तक चलने वाला था ,उस में बड़े बड़े परमऋषि ,देवतागण ,मुनि गन और अग्नि देव अपने अपने अनुयायियों के सहित एकत्र हुए थे | यज्ञ में भगवान् श्रीहरि ही आराध्य देव थे |यज्ञ शाला का वातावरण वेद मन्त्रों से गूँज रहा था |उसी समय उस सभा में प्रजापति दक्ष का प्रवेश हुआ |

दक्ष का आगमन और एक मौन अपमान –

दक्ष अपने तेज से सूर्य के समान प्रकाशमान थे |वे उस विशाल सभा भवन के अन्धकार को दूर करते हुए आये | उन के तेज से पभावित हो कर ब्रम्हा जी और भगवान शिव के अतिरिक्त वहां उपस्थित अग्नि पर्यन्त सभी सभासद अपने अपने आसनों से उठ खड़े हुए | यह शिष्टाचार था – तेजस्वी व्यक्ति के आने पर सम्मान में उठना |दक्ष ने इसे अपना अधिकार समझा ,समस्त सभा से सम्मान प्राप्त कर दक्ष ने अपने पिता जगत् पिता ब्रम्हा जी को प्रणाम किया और उन कि आज्ञा से अपने आसन पर बैठ गये | परन्तु उन्होंने देखा कि भगवान शिव पहले से ही बैठे हैं |उन्होंने न तो उठ कर उन का स्वागत किया ,न वाणी से ही कोई सम्मान प्रदर्शित किया |शिव तो आत्माराम हैं ,उन्हें इस औपचारिकता की आवश्यकता ही नहीं थी ,पर दक्ष के लिए यह असहनीय हो गया |

शिव को पहले ही बैठा हुआ अपने द्वारा अनादृत देख कर दक्ष सहन न कर सके |वे क्रोध से जलती हुई तिरछी दृष्टि से उन की और देख कर बोलने लगे | यहीं से एक छोटे से अहंकार ने एक बड़े वंश के विनाश का बीज बो दिया |

दक्ष ने सभा को सम्बोधित करते हुए कहा – देवताओं ,ब्रम्ह ऋषियों और अग्नियों सहित आप सब मेरी बातें सुनें | मै अज्ञान या इर्ष्या से नहीं बल्कि शिष्टाचार की मर्यादा की रक्षा के लिए कह रहा हूँ | फिर उन्होंने भगवान शिव की कठोर निंदा प्रारम्भ की,उन्होंने कहा -यह निर्लज्ज शिव लोकपालों की पवित्र कीर्ति को धूल में मिला रहा है | इस घमंडी ने सत्पुरुषों के मार्ग को दूषित कर दिया है | आगे उन्होंने कहा -बन्दर जैसी आँखों वाले इस व्यक्ति ने मेरी मृग शावक जैसी नेत्रों वाली पवित्र कन्या का अग्नि और ब्राह्मणों के सामने पाणीग्रहण किया ,इसलिए यह मेरे पुत्र के समान है | इसे तो उठ कर मेरा स्वागत करना चाहिए था ,पर इस ने वाणी से भी मेरा सत्कार नहीं किया |

क्रोध में दक्ष ने और भी कठोर शब्द कहे जैसे कोई शूद्र को वेद पढ़ा दे ,वैसे ही मैंने भूल से अपनी सुकुमारी कन्या इसे दे दी |यह नित्य अपवित्र रहता है ,श्मशानों में भूत प्रेतों के साथ घूमता है ,पागलों कि तरह कभी हंसता है कभी रोता है ,शरीर पर चिता की भस्म लगाता है ,नरमुंडो की माला पहनता है ,नाम से शिव है ,पर वास्तव में अशिव है |यह सारी निंदा उस व्यक्ति के प्रति हो रही थी जो स्वय वैर रहित और शांत था | भगवान शिव ने इस का कोई उतर नहीं दिया | वे पूर्ववत निश्चल भाव से बैठे रहे |उन का यह मौन दक्ष के क्रोध को और भी बढ़ा रहा था |

दक्ष का शाप – यज्ञ भाग से वंचित करना –

निंदा के बाद दक्ष ने आचमन के लिए जल हाथ में लिया ,प्राचीन काल में किसी गंभीर शाप की औपचारिकता बिधि यही थी | उन्होंने कहा -यह देवताओं में अधम शिव अब से इंद्र ,उपेन्द्र आदि देवताओं के साथ यज्ञ में भाग न पाए | सभा के प्रमुख सदस्यों ने दक्ष को बहुत रोका ,पर उन्होंने किसी की न सुनी |शाप दे कर वे अत्यंत क्रोधित हो कर सभा से निकल कर अपने घर चले गए |

यहाँ एक गूढ़ शिक्षा है |दक्ष ने सोचा कि यज्ञ -भाग छीन कर वे शिव का अपमान करेंगे ,पर जो आत्मा राम है,जो सम्मान का भूखा ही नहीं है ,उस का अपमान कोई कैसे कर सकता है ? शाप केवल बाह्य विधि को छू सकता था |शिव के स्वरूप को नहीं |

नन्दीश्वर का शाप –

भगवान शिव के प्रमुख अनुयायी नन्दीश्वर को जब यह समाचार मिला तो वे क्रोध से तमतमा उठे ,उन्होंने देखा कि दक्ष ने तो शाप दिया ही ,पर वहां बैठे ब्राह्मणों ने मौन रहकर उस निंदा का अनुमोदन भी किया |

नन्दीश्वर ने कठोर शाप दिया –

जो इस नश्वर शरीर को ही आत्मा मान कर सब से मित्रता करने वाले भगवान शिव से द्वेष करता है ,वह भेदबुद्धि वाला दक्ष तत्व ज्ञान से सदा विमुख रहे |वह वेदों के अर्थवाद रुपी मीठे वचनों से मोहित होकर गृहस्थी के कपट धर्म में ही आसक्त रहे | उस की बुद्धि देह में ही आत्मबुद्धि करने वाली हो गई है ,वह साक्षात पशु के समान है |वह अत्यंत स्त्री-लम्पट हो और शीघ्र ही उस का मुख बकरे का हो जाए |

आगे उन्होंने कहा- यह मूर्ख कर्मकाण्ड रुपी अबिद्या को ही विद्या समझता है ,अत:यह और इस के अनुयायी जन्म मरण के चक्र में पड़े रहें | ये वेदरूपी लता से फल श्रुति रुपी फूलों कि मोहक गंध से भ्रमित होकर कर्मजाल में ही फंसे रहें,और जो ब्राह्मण केवल पेट पालने के लिए विद्या,तप और व्रत का सहारा लेते हैं ,वे धन ,शरीर और इन्द्रियों के सुख को ही सुख मान कर भिक्षा मांगते हुए भटकते रहें | यह शाप कर्मकाण्ड के दुरूपयोग पर एक तीखी टिप्पणी था |

भृगु ऋषि का प्रतिशाप –

नन्दीश्वर के मुख से ब्राह्मण कुल के लिए शाप सुन कर मह्ऋषि भृगु क्रुद्ध हो उठे ,उन्होंने ब्रम्हदण्ड के रूप में शिव अनुयायों को शाप दिया – जो लोग शिव के व्रत को धारण करते हैं और उन के अनुयायी हैं,वे शत शास्त्रों के विरूद्ध आचारण करने वाले पाखण्डी हों,जो शौचाचार से हीन,जटा ,भस्म और अस्थि धारण करते हैं वे ही शैव दीक्षा में प्रवेश करें ,जहां सुख और आसव ही देवताओं के समान पूज्य है |

भृगु ने कहा -तुम लोग वेद और ब्राह्मणों की निंदा करते हो ,इसलिए तुम ने पाखण्ड का आश्रय लिया है | वेदमार्ग ही सनातन कल्याणकारी मार्ग है ,इस के प्रमाण स्वयं भगवान जनार्दन हैं | तुम इस पाखण्ड मार्ग में जाओ जहाँ भूतों के सरदार तुम्हारे इष्टदेव हैं |

इस प्रकार एक शाप से दुसरे शाप को जन्म दिया |क्रोध कि अग्नि सभा में फ़ैल गई |

भगवान का मौन प्रस्थान – सच्ची महानता

इस पूरे कोलाहल के बीच भगवान शिव ने एक शब्द भी नहीं कहा ,न उन्होंने दक्ष को उतर दिया ,न नन्दीश्वर को रोका ,न भृगु को |

तस्यैव वदत: शापं भृगो -यही इस अध्याय का सब से उज्ज्वल प्रकाश है | संसार में सब से शक्तिशाली हो कर भी मौन रहना ,अपमान सह कर भी प्रतिशोध न करना -यही शिवत्व है,सभा में दक्ष का क्रोध ,शिव का मौन ही सच्चा बल था |

अध्याय का उपसंहार और आगे कि कथा का बीज –

शिव के जाने के बाद भी प्रजापतियों का वह हजार वर्ष बाला यज्ञ चलता रहा | यह यज्ञ भगवन श्रीहरि को ही समर्पित था ,यज्ञ समाप्त होने पर सब ने गंगा यमुना के संगम पर अवभृथ स्नान किया और अपने अपने लोकों को चले गए |बाह्य रूप से यज्ञ पूरा हो गया ,पर भीतर ही भीतर एक बड़ी विपति का बीज बोया जा चुका था | यही शाप आगे चल कर दक्ष के अपने ही यज्ञ के विध्वंस ,वीरभद्र के प्राकट्य और सती के आत्मदाह का कारण बनेगा ,जिस कि कथा अगले अध्यायों में आती है |

इस अध्याय कि पांच प्रमुख शिक्षाएं –

१ – अभिमान सम्मान को विष बना देता है -दक्ष ऐसी सभा में आये जिस का हर व्यक्ति उन के सम्मान में खड़ा था ,फिर भी वे एक व्यक्ति को न उठने पर अटक गए ,जब अहंकार अपमान खोजता है तो उसे मिल ही जाता है |

२- महान व्यक्ति उतर नहीं देता -शिव का मौन सब से बड़ी शिक्षा है |अपमान का उतर अपमान से देने पर विवाद बढ़ता है ,मौन से वह वहीं समाप्त हो जाता है |

३-क्रोध संक्रामक है -एक शाप से दूसरा शाप ,दुसरे से तीसरा | यदि नन्दीश्वर और भृगु भी मौन रहते तो यह श्रृंखला वहीं रूक जाती |

४- श्रद्धा रहित कर्मकाण्ड खोखला है -दक्ष यज्ञ के आचार्य थे,पर उन के हृदय में विनम्रता नहीं थी ,भीतर की विनम्रता के बिना बाहरी अनुष्ठान बालू पर बना घर है |

पवित्रता को बाहरी वेश से न आंकें – शिव श्मशान में रहते हैं ,भस्म लगाते हैं ,फिर भी वे पवित्र और शांत हैं | सच्ची पवित्रता आचरण और चित की है ,वेश की नहीं |

इस प्रकार चतुर्थ स्कन्ध का द्वितीय अध्याय हमें सिखाता है कि सम्बन्धों में शिष्टाचार आवश्यक है ,पर शिष्टाचार को अहंकार का हथियार बनाना विनाश का कारण बनता है | यह कथा आज के परिवार ,समाज और संस्थाओं के लिए भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी सतयुग में थी |

इति श्रीमद्भागवते महापुराण पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे दक्ष शापों नाम द्वितीयोSध्याय: || २||

लेखक- मदन लाल शर्मा

वेबसाइट-http://thegodweknow.com – अगले अध्याय में सती का पिता के यहाँ यज्ञोतस्व में जाने के लिए आग्रह करना |

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