अष्टावक्र गीता -जीवात्मा ,आत्मा,औए परमात्मा का स्वरूप

श्लोक-प्रकृत्या शून्यचितोय: प्रमादाद भावभावन: |निद्रितो बोधित इव क्षीण -संस्मरणों हि स: ||१||

सामान्य अर्थ- जो स्वभाव से ही शून्यचित है,वह लीला से संसार के होने न होने कि बातें करता है | वह निद्रा से जगाए हुए जैसा लगता है क्यों कि इस की सारी संसारिक स्मृतियाँ क्षीण हो गई हैं |

विवेचना-

इस श्लोक के दो शब्द बहुत गहरे हैं ,प्रकृत्या और शून्यचित ,प्रकृत्या का अर्थ है कि यह अवस्था अभ्यास से बनावटी नहीं लाई गई है ,बल्कि आत्मबोध के बाद यह स्वभाविक हो गई है ,जैसे पानी का स्वभाव शीतलता है ,उसे ठंडा नहीं करना पड़ता | शून्य चित का अर्थ जड़ता नहीं है,जड व्यक्ति का चित भरा होता है ,पर वह समझ नहीं पाता ज्ञानी व्यक्ति का चित खाली होता है ,पर वह सब समझता है | यह खालीपन आकाश जैसा है ,जिस में सब कुछ होता है पर कुछ चिपकता नहीं ,प्रमादाद भाव भावन: इस बात को स्पष्ट करता है कि ज्ञानी संसार को सत्य मान कर नहीं सोचता ,वह जानता है कि संसार कल्पना है ,फिर भी व्यबहार के लिए कल्पना का उपयोग करता है | जैसे नाटक में राजा का अभिनय करने वाला व्यक्ति जानता है कि वह राजा नहीं है ,फिर भी संवाद बोलता है | निद्रितो वोधित इव में जनक अपनी स्थिति के बहुत सुन्दर उपमा से बताते हैं | नींद से जागा व्यक्ति अभी आधी नींद में होता है ,उसे संसार धुंधला दिखता है | ज्ञानी भी संसार को धुंधला देखता है क्यों कि उस कि वास्तविक नींद अज्ञान की टूट चुकी है | क्षीण संस्मरणों हि स: यह बताता है कि मुक्ति स्मृति के क्षय में है |

उदाहरण – एक अस्सी वर्ष के बुजुर्ग को देखिये ,जो पहले पूरे परिवार का हिसाब किताब ,खेत का काम ,बच्चों कि चिंता अपने सिर | अब बेटों ने सब सम्भाल लिया है |वह सुबह उठ कर खेत की मेड पर बैठते हैं ,कभी बोल देते हैं आज निराई कर लेना ,पर भीतर कोई बोझ नहीं |लोग समझते हैं वह आदेश दे रहे है |,पर वह केवल लीला से बोल रहे हैं |उन का मन तो कहीं और शांत है | कोई उन से पूछे कि पिछले साल कितनी फसल हुई थी ,उन्हें ठीक याद नहीं ,क्यों कि हिसाव से स्मृति क्षीण हो गई है |

जैसे आप रेलगाड़ी में बैठते हैं ,खिड़की से बाहर पेड़ भाग रहे हैं ,आप देख रहे हैं ,पर दौड़ नहीं रहे ,वैसे ही ज्ञानी संसार की भाग दौड़ को देखता है पर दौड़ता नहीं | एक और उदाहरण है ,सिनेमा हाल में बैठा दर्शक ,पर्दे पर आग लगती है ,बाढ़ आती है ,पर दर्शक की कुर्सी नहीं जलती |वह प्रमाद से खेल की तरफ देख रहा है |निंद्रा से जागे व्यक्ति जैसा उस का व्यबहार है |वह खाना खाता है ,पर स्वाद में बंधता नहीं ,बात करता है ,पर शब्दों में उलझता नहीं |यही शून्य चित की सहज अवस्था है |

श्लोक – क्व धनानि क्व मित्राणिक्व में विषयदस्यव: क्व शास्त्रं क्व च विज्ञानं यदा में गलिता स्पृहा || २||

सामान्य अर्थ – जब मेरी सारी स्पृहा गल गई,तब धन कहाँ,मित्र कहाँ.विषय रुपी लुटेरे कहाँ ,शास्त्र कहाँ और विज्ञान कहाँ अर्थात इन में से किसी का मेरे लिए कोई अर्थ नहीं रहा |

विवेचना –

इस श्लोक में स्पृहा शब्द केंद्र में है |स्पृहा ही ससार की जड है |गीता में भी कहा गया है कामना से ही सृष्टि चलती है | अष्टावक्र कहते हैं गलिता स्पृहा का गल जाना ,पिघल जाना |यह दमन नहीं है ,यह ज्ञान अग्नि में पिघलना है ,जब तक स्पृहा है ,तब तक धन महत्वपूर्ण लगता है ,क्यों कि लगता है उस से सुरक्षा मिलेगी | मित्र महत्वपूर्ण लगते हैं ,क्यों कि लगता है उन से प्रेम मिलेगा |विषय महत्वपूर्ण लगते हैं ,क्यों कि लगता है उन से सुख मिलेगा |शास्त्र महत्वपूर्ण लगता है ,क्यों कि लगता है उस से उतर मिलेगा |विज्ञान भी महत्वपूर्ण लगता है क्यों कि लगता है उस से सिद्धि मिलेगी ,पर जब आत्म तृप्ति हुई ,तब पता चला कि मैं तो स्वयं ही पूर्ण हूँ तब किस की स्पृहा जैसे पेट भर जाने पर छप्पन भोग भी सामने रखें हों तो आकर्षण नहीं होता |

क्व शब्द बार बार आ कर आश्चर्य और उपदेश दोनों दिखता है |क्व धनानि ,अरे धन कहाँ,मित्र कहाँ यह तुच्छता का भाव नहीं ,स्वतन्त्रता का भाव है |ज्ञानी न तो धन का विरोधी है , न मित्रों का त्यागी ,वह केवल स्पृहा का त्यागी है |स्पृहा गई तो ससार कि सता गई ,क्यों कि संसार बाहर नहीं ,स्पृहा में ही बसता है |

उदाहरण-मान लीजिये एक व्यक्ति को तेज बुखार है ,मुंह कडवा है शरीर टूट रहा है |उस के सामने सोने कि थाली में लड्डू ,जलेवी काजू कतली रखी है |मित्र बाहर हंसी मजाक कर रहे हैं ,सुगन्धित इत्र ,सुन्दर संगीत और हाथ में सब से मंहगी पुस्तकें रखी हैं | क्या उस बुखार वाले व्यक्ति का मन इन में लगेगा | वह कहेगा मेरे लिए अभी इन का कोई अर्थ नहीं ,ठीक इसी प्रकार जब आत्म ज्ञान का स्वास्थ्य आता है ,तो संसार की मिठास फीकी लगती है |

एक दूसरा उदाहरण लीजिये -एक माँ जिस का बेटा कई सालों बाद विदेश से लौटा है |उस मिलन के आनन्द में उसे न भूख याद रहती है न प्यास ,न धन की चिंता ,स्पृहा तृप्त हो गई |तीसरा उदाहरण -एक व्यापारी जो जीवन भर धन जोड़ता है |एक दिन उसे पता चलता है कि उस का सारा धन नकली है ,पर उस का परिवार सुरक्षित है | उसी क्षण धन का मुल्य शून्य हो जाता है |जनक कहते हैं मेरे साथ भी ऐसे ही हुआ | जब आत्मा मिली तो लगा अब धन कहाँ ,विषय कहाँ |जैसे दिया जल जाए तो अँधेरे में टटोलने की लकड़ी की जरूरत नहीं रहती |

श्लोक – विज्ञाते साक्षिपुरुषे परमात्मनि चेश्वरे | नैराश्ये च न चिंता मुक्तये मम || ३||

सामान्य अर्थ – साक्षी पुरुष जो परमात्मा और ईश्वर है उसे जान लेने का बंध और मोक्ष दोनों से निराशा हो गई और अब मुझे मुक्ति की भी चिंता नहीं है |

विवेचना –

यह श्लोक अष्टावक्र गीता के हृदय जैसा है | इस में तीन शब्द बहुत महत्वपूर्ण हैं ,साक्षी परमात्मा और ईश्वर,साक्षी का अर्थ है केवल देखने वाला ,कर्ता नहीं ,भोक्ता नहीं ,परमात्मा का अर्थ है परम सत्य जो सब के भीतर है | ईश्वर का अर्थ है नियन्ता ,सब का स्वामी |जनक कहते हैं ये तीनों अलग अलग नहीं एक ही हैं |जिसे हम ने बाह्य ईश्वर समझा .वही भीतर साक्षी है |विज्ञाते शब्द का अर्थ है विशेष रूप से जानना ,अर्थात पुस्तक से नहीं ,प्रत्यक्ष अनुभव से जानना |जब यह अनुभव होता है तो बंध और मोक्ष दोनों की चिंता मिटती है ,नैराश्ये शब्द बहुत सुन्दर है | साधारण मनुष्य धन से निराश होता है तो नैराश्य समझता है ,पर ज्ञानी बंध और मोक्ष दोनों से निराश हो जाता है | अर्थात उसे अब न बंधन में रुचि है न मुक्ति में ,क्यों कि दोनों मन की कल्पनाएँ हैं | रस्सी को सांप समझ कर डरना बंध है और सांप को भगाने की कोशिश मोक्ष है |जब पता चला रस्सी ही है तो डर भी गया और भगाने की कोशिश भी गई |इएलिए जनक कहते हैं न चिंता मुक्तये मम,मुझे अब मुक्ति की भी चिंता नहीं | यह आलस्य नहीं है यह पूर्णता है |मुक्ति की चिंता भी अहंकार को ज़िंदा रखती है |

उदाहरण – एक छोटा बच्चा मेले में अपने पिता की ऊँगली पकड़े चल रहा है ,भीड़ बहुत है बच्चा नीचे खिलोने देखने लगता है ,ऊँगली छूटने का भ्रम होता है और वह रोने लगता है कि मैं खो गया ,मुझे बचाओ ,मुझे मुक्त करो ,पिता तो वहीं खड़ा है ,ऊँगली पकड़े हुए मुस्कुरा रहा है | जैसे ही वच्चा उपर देखता है और पिता का हाथ देखता है उस का खोने का बंध और बचने की चिंता दोनों एक साथ समाप्त हो जाते हैं | उसे कहीं जाना नहीं पड़ता ,केवल देखना पड़ता | वैसे ही हम अक्सर के मेले में साक्षी रुपी पिता की ऊँगली पकड़े ही हैं |

दूसरा उदाहरण है सपने में जेल देखना |अपने में आप जेल में बंद ,वकील ढून्ढ रहे हैं ,जमानत की अर्जी लिख रहे हैं | जैसे ही नींद खुलती है ,पता चलता है आप तो अपने विस्तर पर हैं , न जेल थी ,न जमानत की जरूरत | तीसरा उदाहरण है रस्सी में सांप का भ्रम ,सांप दिखा तो डर लगे,डंडा ढूँढो,यह मोक्ष की कोशिश है |ज्ञान हुआ कि रस्सी है तो डर भी गया और डंडा भी रख दिया | जनक की यही दशा है ,साक्षी को जान कर बंध और मोक्ष दोनों की कहानी समाप्त हो गई |

श्लोक- अंतर्विकल्पशून्यस्य बहि: स्वछन्दचारिण: |भ्रान्तस्येव दशास्तास्टार -तादृशा एव जानते ||४||

सामान्य अर्थ – भीतर से विकल्प शून्य और बाहर से स्वछन्द आचारण करने वाले की दशा पागल जैसी दिखती है ,उसे वैसा ज्ञानी ही जान सकता है |

विवेचना –

यह श्लोक समाज और ज्ञानी के सम्बन्ध को स्पष्ट करता है | संसार नियम से चलता है ,ज्ञानी नियम से परे है |संसार कहता है ,ऐसे उठो,ऐसे बैठो ,ऐसे बोलो | ज्ञानी के भीतर कोई विकल्प नहीं ,बचा ,इसलिए वह किसी नियम का गुलाम नहीं |वह स्वछन्द है अर्थात अपने स्व में ,अपने आनन्द में स्थित है ,इसलिए जैसे मौज में आये वैसा करता है |यह स्वछंदता उच्छृंखलता नहीं है ,वह सहजता है |उच्छृंखलता व्यक्ति भीतर से वासना से भरा होता है और बाहर नियम तोड़ता है |ज्ञानी भीतर से खाली होता है और बाहर नियम से परे होता है |दोनों बाहर से एक जैसे दिख सकते हैं ,पर भीतर जमीन आसमान का अंतर है |इसलिए कहा -भ्रातंस्येव ,वह भ्रान्त जैसा दिखता है |समाज उसे पागल कहेगा ,क्यों कि समाज को कारण चाहिए |ज्ञानी बिना कारण हंस देता है ,बिना कारण रो देता है ,बिना कारण मौन हो जाता है |तर्क से उसे समझा नहीं जा सकता | तादृशा एव जानते यह बहुत गहरी बात है |ज्ञानी को केवल ज्ञानी ही जान सकता है |जैसे एक संगीतकार के आलाप की बारीकी को दूसरा संगीतकार ही समझता है ,श्रोता तो केवल ध्वनी लगती है ,इसलिए ज्ञानी की निंदा या स्तुति दोनों व्यर्थ हैं |

उदाहरण-गाव में एक मस्त फ़क़ीर आया ,वह कभी बच्चों के साथ गुल्ली डंडा खेलने लगता ,कभी दूकान में बैठ कर बिना पैसे दिए चाय पी जाता ,कभी घंटो तक एक पेड़ के नीचे मौन बैठा रहता ,कभी जोर जोर से हंसने लगता | गाव के लोग कहने लगे यह पागल है ,उस का दिमाग खराब हो गया है | कोई उसे पत्थर मारता ,कोई प्रणाम करता |पर जब दूसरा फकीर उसी गाव में आया ,उस ने देखते ही पहचान लिया कि यह तो पहुंचा हुआ है |उस ने कहा यह भ्रान्त नहीं, मुक्त है |

आज के जीवन में भी देखिये ,एक सेवा निवृत अधिकारी जो पहले समय पर दफ्तर चला जाता था ,अब कभी सुबह चार बजे घुमने निकल जाता है ,कभी दोपहर तक सोता है ,कभी बिना बजह गली के बच्चों को टॉफी बाँट देता है |परिवार कहता है बाबू जी सठिया गए हैं |पर वास्तव में उस ने भीतर के सारे विकल्प छोड़ दिए हैं ,अब क्या कहेंगे लोग ,क्या होगा इस चिंता से मुक्त है |उस की मस्ती को वही समझेगा जो स्वयं मस्त है |जैसे पतंग की डोर का खेल दो पतंगबाज ही समझते हैं |बाहर से देखने वाले को तो केवल पतंग कटती दिखती है |इसलिए ज्ञानी को ज्ञानी ही जानता है |

इति अष्टावक्र गीता चतुर्दश अध्याय

लेखक-मदन लाल शर्मा

वेबसाइट -http://thegodweknow.com -इसी अध्याय का सार आगे

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