त्याग मूर्ति श्री भरत जी

आगे होई जेहिं सुरपति लेई | अरध सिंघासन आसन देई||

-यह महाराज दशरथ का प्रभाव कहा गया है | अयोध्या के चक्रवर्ती सम्राट का वह सिंहासन भरत के लिए सुलभ था |श्रीराम वन में चले गये ,महाराज दशरथ ने उन के वियोग में देह को त्याग दिया |अयोध्या सूनी हो गयी | जब राज्यपरिषद् एकत्र हुई ,तब किसी को इस के अतिरिक्त कोई मार्ग ही नहीं सूझता था कि भरत शासनाधीश बनें | सत्यप्रतिज्ञ श्रीराम चौदह वर्ष से पूर्व वन से लौट नहीं सकते और न लक्ष्मण या जनकनन्दिनी के लौटने की सम्भावना है | अयोध्या का सिहासन रिक्त तो रहना नहीं चाहिए | मंत्रियों ने ,प्रजा के प्रमुख लोगों ने ,गुरु वशिष्ठ ने तथा माता कौशल्या तक ने आग्रह किया कि भरत को सिंहासन स्वीकार कर लेना चाहिए |कम से कम चौदह वर्ष तो अवश्य वे राज्य करें |

सौपेहु राजु राम के आएं | सेवा करेहु सनेह सुहाएँ ||

लेकिन भरत का उतर बहुत स्पष्ट है –

हित हमार सियपति सेवकाई | सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई ||

सोक समाजु राजु केहि लेखें | लखन राम सिय बिनु पद देखें ||

जिस राज्य की स्पृहा सुरपति को भी हो ,वह ठुकराया फिर रहा था | भरत वन को चले और चले भी नंगे पैर ,पैदल | उन से जब रथ पर बैठने को कहा गया ,तब वे बोले –

राम पयादेहि पाय सिधारे | हम कहँ रथ गज बाजि बनाए ||

सिर भर जाऊं उचित अस मोरा | सब तें सेवक धर्म कठोरा ||

“श्रीराम पैदल गये इस पथ में और मेरे लिए रथ,हाथी,घोड़े ,अरे मुझे तो सिर के बल चल कर जाना चाहिए ,क्यों कि मैं उन का सेवक हूँ |”

श्री राम को लौटना नहीं था ,वे लौटने के लिए तो वन गये नहीं थे ,किन्तु भरत को संतुष्ट कर के ही उन्होंने लौटाया |श्री राम का व्रत रहा तो भरत का प्रेम भी सम्पूर्ण सम्मानित हुआ |भरत लौटे श्री राम की चरण पादुका लेकर | राज्य का कार्य वे करेंगे तो केवल प्रतिनिधि के रूप में और वह भी राजभवन में रह कर नहीं |अग्रज वन में पर्णकुटी में रहता है तो अनुज ने भी नन्दिग्राम में पर्णकुटी बनायी और उस में रहे |

श्री राम कंद मूल फल का आहार करते होंगे ,किन्तु भरत ने तो चौदह वर्ष गोमूत्र यावक व्रत किया |अर्थात यव गाय को खिलाया ,वह गोवर में निकला उसे धो कर,स्वच्छ करके गोमूत्र में पकाया गया और दिनरात में एक बार उस का आहार किया गया |यह तप भी कोई क्लेश मान कर नहीं किया गया |

यह अवस्था भरत की रही |

इति-

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