स्वामी विवेकानन्द के विचार
संसार का प्रतेक धर्म गंगा और युफ्रेटिस नदियों के मध्यवर्ती भूभाग पर उत्पन्न हुआ है | एक भी बड़ा धर्म यूरोप या किसी दूसरे देश में पैदा नहीं हुआ |सभी धर्म एशिया भूखंड में ही पैदा हुए वह भी केवल उसी अंश के बीच | यह धर्म अभी भी चल रहे हैं और कितने ही मनुष्यों के लिए उपकार जनक हैं |
सनातन धर्म वेदों पर आधारित है |वेदान्त में दिए हुए धर्म के सिधान्त अपरिवर्तनीय हैं ,क्यों कि वे उन शाश्वत सिधान्तों पर आधारित हैं जो कि पुरुष और प्रकृति में हैं | वे कभी भी परिवर्तित नहीं हो सकते | आत्मा और मोक्ष प्राप्ति आदि के विचार कभी भी नहीं बदल सकते | भिन्न भिन्न मत-मतान्तरों पर विश्वास की तरह सनातन धर्म नहीं है सनातन धर्म तो प्रत्यक्ष अनुभूति के साक्षात्कार का धर्म है | इस धर्म में आध्यात्मिकता का एकजातीय भाव देखने को मिलता है |
धर्म अनुभूति की वस्तु है मुख की बात ,मतवाद अथवा युक्तिमूल्क कल्पना नहीं है -चाहे वह कितनी ही सुंदर हो | आत्मा की ब्रह्मस्वरूपता को जान लेना ,उस में लीन हो जाना ,उस का साक्षात्कार करना यही धर्म है | धर्म केवल सुनने या मान लेने की वस्तु नहीं है ,समस्त मन प्राण विश्वास के साथ एक हो जाएँ -यही धर्म है |
धर्म का अर्थ आत्मानुभूति है परन्तु केवल कोरी बहस,खोखला विश्वास ,अँधेरे में टटोलबाजी तथा तोते के समान शब्दों को दोहराना और ऐसा करने में धर्म समझना एवं धार्मिक सत्य से कोई राजनितिक विष ढून्ढ निकालना -यह सब धर्म बिलकुल नहीं है |
प्रतेक धर्म के तीन भाग होते हैं |पहला दार्शनिक भाग-इस में धर्म का सारा मूल तत्व ,उद्देश्य और लाभ के उपाय निहित हैं | दूसरा पौराणिक भाग -यह स्थूल उदाहरणों द्वारा दार्शनिक भाग को स्पष्ट करता है | इस में मनुष्यों एवं अति प्राकृतिक पुरुषों के जीवन के उपाख्यान आदि लिखे हैं | इस में सूक्ष्म दार्शनिक तत्व मनुष्यों या अति-प्राकृतिक पुरुषों के जीवन के उदाहरणों द्वारा समझाये गये हैं | तीसरा आनुष्ठानिक भाग – यह धर्म का स्थूल भाग है | इस में पूजा पद्धति ,आचार ,अनुष्ठान , शारीरिक विविध अंगबिन्यास ,पुष्प ,धुप,धूनी प्रभृति नाना प्रकार की इन्द्रिय ग्राह्य वस्तुएं हैं| इन सब को मिला कर आनुष्ठानिक धर्म का संगठन होता है | सारे विख्यात धर्मों के यह तीन भाग हैं |
ईश्वर पृथ्वी के सभी धर्मों में विद्यमान है | वह अनंत काल से वर्तमान है और अनन्तकाल तक रहेगा |भगवान ने कहा है -” मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव |” मैं इस जगत में मणियों के अंदर सूत्र की तरह वर्तमान हूँ -प्रत्येक मणि को एक विशेष धर्म -मत या सम्प्रदाय कहा जा सकता है | पृथक पृथक मणियाँ एक एक धर्म हैं और प्रभु ही सूत्र रूप से उन सब में वर्तमान हैं |
निस्वार्थ होना ही धर्म की पहचान है | जो जितना अधिक नि:स्वार्थी है वह उतना ही अधिक आध्यात्मिक और ईश्वर के समीप है | जहाँ यथार्थ धर्म वहीं आत्मबलिदान ,अपने लिए कुछ भी मत चाहो ,दूसरों के लिए ही सब कुछ करो -यही है ईश्वर में तुम्हारे जीवन की स्थिति ,गति और प्रगति |
क्या वास्तव में धर्म का कोई उपयोग है ?हाँ ,वह मनुष्य को अम्रर बना देता है | उस ने मनुष्यों के निकट उस के यथार्थ स्वरूप को प्रकाशित किया है और वह मनुष्यों को ईश्वर बनाएगा | यह है धर्म की उपयोगिता | मानव समाज से धर्म अलग कर लो तो क्या रह जाएगा |कुछ नहीं केवल पशुओं का समूह |
संसार में जितने भी धर्म हैं ,वे परस्पर विरोधी या प्रतिरोधी नहीं हैं | वे केवल एक ही चिरन्तन शाश्वत धर्म के भिन्न भिन्न भावमात्र हैं | यही एक सनातन धर्म चिरकाल से समस्त विश्व का आधाररूप रहा है |
