संयम -पालन के आदर्श (अर्जुन)

भगवान व्यास के निर्देशानुसार पांडवों ने नियम बनाया था कि द्रोंपदी के साथ पन्द्रह पन्द्रह दिन प्रत्येक भाई रहे | जब एक भाई द्रौपदी के साथ एकांत में हो ,दूसरा वहां न जाये | इस नियम का उल्लंघन करने वाला बारह वर्ष निर्वासित जीवन व्यतीत करे |

एक बार एक ब्राह्मण दौड़ता पुकारता इन्द्रप्रस्थ राजसदन पहुंचा | दस्यु उस की गाये हांकें जा रहे थे | संयोग ऐसा था कि उस समय अर्जुन के अतिरिक्त वहां कोई न था और अर्जुन का धनुष जिस कक्ष में था ,वहां युधिष्ठर द्रौपदी के साथ बैठे थे | अर्जुन सिर् झुकाये उस कक्ष में गये और धनुष उठा कर बाहर आ गये | रथ पर बैठे गाण्डीवधारी को देखते ही दस्यु भाग खड़े हुए | उन्हें दंड मिला और ब्राह्मण को उस की गायें |

“आप मुझे आज्ञा दे “,कार्य समाप्त करके अर्जुन ने देश त्याग की तैयारी की और धर्मराज से विदा मांगी | युधिष्ठर बोले -” उस समय द्रौपदी के साथ मैं केवल भगवश्चर्या कर रहा था | वैसे भी छोटे भाई को बड़े भाई के अन्त:पुर में जाने से दोष नहीं होता |ब्राह्मण की गायें उसे दिलाना राजा का धर्म था | तुम ने मेरे ही धर्म की रक्षा के लिए यह किया है | अत: तुम्हें निर्वासन स्वीकार करने की आवश्यकता नहीं है |”

अर्जुन बोले-“धर्म पालन में बहाना नहीं ढूँढना चाहिए भय,लोभ अथवा क्लेश के डर से धर्म का त्याग अधर्म ही है |हम लोगों ने जो नियम बनाया ,उस में कोई अपवाद नहीं रखा है | अत: मुझे उस का पालन करना ही चाहिए |

उन्होंने स्वेच्छा से निर्वासन स्वीकार किया और बारह वर्ष पर्यटन करते रहे |

= = = = = = = पांडव वन में थे ,तब भगवान् व्यास की सम्मति से अर्जुन तपस्या करके भगवान् शंकर से पाशुपतास्त्र प्राप्त करने गए थे | उन्होंने पिनाक पाणी प्रभु को अपने तप तथा पराक्रम से प्रसन्न किया | पाशुपत तो मिला ही ,देवताओं के अनेक अस्त्र और मिले | देवराज ने रथ भेज कर उन्हें स्वर्ग बुलबाया|वहां अर्जुन ने असुरों का दमन किया | इस के उपलक्ष्य में देवसभा में अर्जुन का सत्कार किया गया |अप्सराओं ने नृत्य किया,गन्धर्वो ने गायन किया |

देवराज ने देखा कि अर्जुन बार बार उर्वशी की तरफ देख रहे हैं | उन्होंने गन्धर्व राज चित्रसेन को आदेश दिया कि वे उर्वशी को अर्जुन की सेवा में भेज दें | उर्वशी स्वयं अर्जुन के रूप तथा पराक्रम पर मोहित हो चुकी थी |स्वर्ग की सर्व श्रेष्ठ अप्सरा उर्वशी -उस ने अपनी सम्पूर्ण कला अपना श्रृंगार करने में उस दिन व्यय कर दिया | रात्रि में अकेली अर्जुन के निवास पर वह पहुंची |

“माता ,कौन्तेय अर्जुन प्रणाम करता है |” उर्वशी को देखते ही धनन्जय उठे और अंजलि बांध कर झुक गये |” आप ने इस असमय में कैसे कष्ट किया |” उर्वशी ने अभिप्राय बताया और कहा कि मैं इंद्र के आदेश से यहाँ आई है | अर्जुन बोले -देवराज को मेरा अभिप्राय समझने में भ्रम हुआ | हमारे कुल की जननी हैं आप | भरत कुल की माता आप को जान कर मैं बार बार आप के चरण दर्शन उस समय कर रहा था |

” स्वर्ग की अप्सराएं किसी की माता या भगिनी नहीं हैं |वे प्रत्येक पुण्यात्मा की भोग्या हैं|” वासना विवश उर्वशी ने समझाने का बहुत प्रयत्न किया | ” जैसे मेरी माता कुंती है ,माद्री है और शची है ,वैसे ही आप मेरी माता हैं | पुत्र को आपका आशीर्बाद दें | उस एकांत में ,उर्वशी का श्रृंगार तथा उस की चेष्टा ही नहीं विनय भी अर्जुन को विचलित नहीं कर सकी |:

” तुम नपुंसक रहो वर्षभर | स्त्रियों को नृत्य गीत सिखाओ |” निराश क्षुब्ध उर्वशी ने अर्जुन को शाप दे दिया | लेकिन धर्म का पालन कभी विपति नहीं बनता | उर्वशी का शाप अर्जुन के लिए वरदान बन गया | अज्ञातवास के समय उस के कारण ही वे अज्ञात रह सके |

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