परोपकार मानव धर्म
संसार में अनन्त जीव हैं ,उन में मानव ही सर्व श्रेष्ठ है | मह्रिषी व्यास जी ने भी यही कहा है कि मनुष्य से बढ़ कर और कोई भी प्राणी नहीं |धर्म और अधर्म ,पाप और पुन्य के सम्बन्ध में जितना विचार मनुष्य ने किया है ,उतना वेदों ने भी नहीं किया है | पशुपक्षियों का जीवन प्राकृतिक है उन में मानव जैसी कोई भी विशेषता नहीं होती|देवों का जीवन विलासमय है ,उन्हें भी आत्मचिंतन का समय नहीं मिलता | नर्क में रहने वाले नारकी तो हर समय दु:ख में ही रहता है | मनुष्य ही है जो धर्म और अधर्म के बारे में सोचता रहता है और पाप को छोड़ कर तथा पुन्य अवं धर्म अपना कर परमात्मा तक बन सकता है |
व्यास जी कहते हैं कि पुन्य चाहते हो तो परोपकार करो और अगर दूसरों को पीड़ा दोगे तो पाप का फल भोगने के लिए तैयार हो जाओ | सभी लोग चाहते हैं कि उन्हें सभी तरह के सुख मिलें |धन,परिवार ,निरोगी शरीर ,लम्बी उम्र आदि सुख पुन्य करने से ही मिलते हैं | पाप का परिणाम कष्टदायक ही होता है | पाप करने वाला व्यक्ति भी पापों के परिणाम से बचने की सोचते हैं पर यह मानी हुई बात है जैसा करोगे वैसा भरोगे | जैसा बीज बोया जायेगा उस का फल भी वैसा ही मिलेगा | आक और धतूरे का बीज बो कर आम के फल की कामना करना बेकार है | कितने आश्चर्य की बात है कि लोग पाप के परिणाम से बचना तो चाहते हैं लेकिन पाप वृतियों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होते | पुन्य के परिणाम स्वरूप मिलने वाल सुख तो सभी चाहते हैं पर परोपकार पुन्य कार्यों की और प्रवृत नहीं होते | चाहते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं यही आश्चर्य है |
परोपकार दूसरे के उपकार को कहा जाता है ,पर वास्तव में तो उस से अपना ही उपकार अधिक होता है ,क्यों की उपकार से पुन्य की प्राप्ति होती है और पुन्य से सभी प्रकार के सुख मिलते हैं | जिस का उपकार किया जाता है उसे तो थोडा और तात्कालिक सुख मिलता है पर करने वाले को तो बहुत अधिक और लम्बे समय तक सुख मिलता है | पाप क्या है और पुन्य क्या है ? मनुष्य के अच्छे और बुरे काम ही तो हैं | अच्छे का फल अच्छा और बुरे का फल बुरा मिलेगा ही | अब प्रश्न आता है कि कौन सा काम अच्छा है और कौन सा काम बुरा ? व्यास जी ने इस की व्याख्या इस प्रकार की है कि दुसरे को कष्ट पहुंचाना पाप है | कष्ट अनेक प्रकार से पहुंचाया जा सकता है किन कार्यों के करने से दूसरों को कष्ट पहुंचता है वह इस प्रकार से हैं – हिंसा,झूठ बोलना , चोरी करना, मैथुन ,परिग्रह,क्रोध, मान, माया, लोभ,राग, द्वेष ,कलह, झूठा कलंक लगाना, चुगली करना,अच्छे और बुरे की भावना, राग और घृणा ,निंदा करना कपट पूर्वक झूठ बोलना ,झूठ को छुपाने का प्रयत्न करना , वस्तु जिस रूप में है उस से अन्यथा समझना | इन सब पापों में हम कौन सा पाप ,किस समय कर रहे हैं ,इस का ध्यान रखना आवश्यक है | मन,वचन और शरीर द्वारा कोई भी पाप प्रवृति हो रही है तो उसे रोकना चाहिए | आज नहीं तो कल इस संसार में नहीं तो अगले जन्म में इस का परिणाम तो भोगना ही पड़ेगा यह कभी नहीं भूलना चाहिए |
पुन्य किसी भी प्राणी को दु:ख और कष्ट से बचाने ,उस की सुख सुविधा का उपाय करने से होता है | जिस व्यक्ति को जिस प्रकार की सहायता की जरूरत है उसे अन्न ,पानी,वस्त्र,स्थान,औषध आदि देना ,शिक्षा ,परामर्श दे कर उन्नत बनाना यह सब पुन्य के काम हैं | जितनी भी शुभ प्रवृतियें हैं पुन्य हैं , और अशुभ प्रवृतियाँ पाप हैं | हमें शुभ की और प्रवृत होना चाहिए और अशुभ से बचना चाहिए |
परोपकार इस विश्व की व्यवस्था ठीक से चले इस के लिए बहुत जरूरी है | क्यों की प्राणियों का जीवन एक दुसरे के सहयोग पर निर्भर करता है ,यदि माता अपनी सन्तान का पालन न करे तो बच्चों की क्या स्थिति होगी ? जब हम दूसरों का प्यार और सहयोग या उपकार पाते ही रहते हैं तो हमारा भी कर्तव्य बनता है कि हम भी दूसरों का उपकार करें | वैसे भी पशु पक्षी आदि प्राणियों का भी हम पर बहुत कुछ उपकार हो रहा है | इसलिए अपने शरीर के भरण पोषण तक ही नहीं सिमित हो जाना चाहिए बल्कि दूसरों के लिए भी यह काम आये इस का लक्ष्य होना चाहिए |
यह शरीर तो प्रतिक्षण नाश हो रहा है और जीवात्मा निकल जाने के बाद इस शरीर को जला दिया जाएगा | अत: यह गुण रहित है | इस से जो कुछ भी दूसरों की भलाई हो जाए ,वही अच्छा है |इस शरीर से परोपकार द्वारा महान गुण प्राप्त कर लेना ही शरीर धारण करने की सार्थकता है | शरीर की तरह अपनी बुद्धि आदि अन्य शक्तियों का उपयोग भी दूसरों के सुख और उत्थान में होना चाहिए | अपने लिए तो सभी जीते हैं लेकिन जो दूसरों के लिए जीते है उसी का जीवन सार्थक है | इस लिए कहा गया है -सत पुरुष वही है जो बिना किसी स्वार्थ के हमेशा परहित में लगे रहते हैं | सूर्य किस की आज्ञा से अन्धकार को मिटा रहा है?,वृक्ष रास्ते में चलने वालों को क्यों छाया दे रहे हैं ? मेघ किस की आज्ञा से वर्षा कर रहे हैं ? अर्थात स्वभाव के कारण ही इन से परोपकार हो रहा है | इसी प्रकार सत पुरुष भी अपने स्वभाव के कारण ही दूसरों के हित करने में लगे रहते हैं |नदियें स्वयं पानी नहीं पीती ,वृक्ष स्वयं फल नहीं खाते , मेघ अन्न नहीं खाते ,दूसरों के लिए ही इन का जीवन है | इसी तरह सत पुरुष भी अपनी आत्म प्रेरणा से अपनी सम्पति भी पर हित में लगा देते हैं | नदियें पर हित के लिए बहती हैं ,गायें पर हित के लिए दूध देती हैं ,यह शरीर परोपकार के लिए ही है |
शास्त्रों में भी कहा गया है कि परोपकार रहित मनुष्य का जीवन धिक्कार का पात्र है ,क्यों की पशु कहलाने वाले प्राणियों का चमडा भी मनुष्य के काम आता है अर्थात परोपकार न करने वाले मनुष्यों का जीवन पशुओं से भी गया बीता है | अन्यत्र कहा गया है कि परोपकार से जो पुन्य उत्पन्न होता है वह सेंकडों यज्ञों से भी उत्पन्न नहीं होता | जिन के ह्रदय में परोपकार की भावना जाग्रत रहती है उन की आपदाएं नाश हो जाती हैं उन्हें पग पग पर सम्पति मिलती रहती है | जैसा सुख और दु:ख हम दूसरों को देते हैं वैसा ही सुख दु:ख उसी परिमाण में हमें भी प्राप्त होता है | तुलसी रामायण में भी कहा गया है कि परहित के समान कोई भी धर्म नहीं है |
रविन्द्रनाथ के अनुसार मैंने अम्रर जीवन और प्रेम को वास्तविक पाया और यह कि मनुष्य निरन्तर सुखी बना रहना चाहता है तो उसे परोपकार के लिए ही जीवित रहना चाहिए |
किसी बच्चे को खतरे से बचा लेने पर हमें जितना आनंद मिलता है ,परोपकार इसी आनंद की प्राप्ति के लिए किया जाता है |परोपकार करने की ख़ुशी से दुनिया की सारी खुशियाँ छोटी होती हैं | परोपकारी लोग हमेशा प्रसन्नचित रहते हैं | वह वृथा नहीं जाता जो अपना धन,अपना तन,अपना मन,अपना वचन दूसरों की भलाई में लगाता है | संत लोग परोपकार करते समय अपनी भलाई की आशा नहीं रखते | परोपकारी अपने कष्ट को नहीं देखता ,क्यों कि वह परहित जनित करुणा से ओतप्रोत होता है | अपने हित के लिए दूसरों का हित करना जरूरी है |
आज परोपकार की भावना लुप्त होती जा रही है | लोगों ने अपने स्वार्थ को प्रधानता दे दी है वे दूसरे के नुकसान की बात सोचते तक नहीं | इसलिए इस परोपकार की भावना को जाग्रत करना बहुत जरूरी है | संक्षेप में कहा जाये तो परोपकार मानव धर्म है | ध्यान रहे परोपकार करते समय हमें अभिमान नहीं आना कहिये प्रतिफल की इच्छा नहीं होनी चाहिए | परोपकार की भावना चंद व्यक्तियों तक ही सिमित है इस का दायरा बढना चाहिए ,जितना ध्यान हम अपने परिवार का रखते हैं उतना ही हमे अन्य लोगों का भी रखना चाहिए | अगर हम ऐसा करने लग पड़ें तो संसार के दु:ख दर्द अशांति में कमी आएगी ,आत्मियकता का विस्तार होगा तथा मानव जन्म सफल हो जायेगा |
