शिव जी का संकट मोचन रूप
(पुराणों से कहानियाँ )
भगवान शिव ने समस्त भोगों का त्याग कर रखा है लेकिन जो भी उन की उपासना करता है चाहे वह कोई भी हो वे हमेशा धनी और एश्वर्य सम्पन्न हो जाते हैं, लेकिन भगवान् विष्णु लक्ष्मी पति हो कर भी उन की उपासना करने वाला धनी और भोग सम्पन्न नहीं होता | दोनों ही भगवान् त्याग और भोग की दृष्टि से एक दूसरे से विरुद्ध स्वभाव वाले हैं |शिव जी वे सत्व आदि गुणों से युक्त तथा अहंकार के देवता हैं ,अहंकार के तीन भेद हैं वैकारिक ,तेजस और तामस |ऐसे देवता की उपासना करने से समस्त एश्वर्यों की प्राप्ति होती है लेकिन भगवान् विष्णु प्रकृति से परे स्वयं पुरुषोतम एवं प्राकृत गुणरहित हैं |जो उन का भजन करता है वह स्वयं भी गुणातीत हो जाता है | जिस पर वह कृपा करते हैं उस का सब धन धीरे धीरे छीन लेते हैं तब उस के सगे सम्बन्धी उसे छोड़ जाते हैं उस की धन प्राप्ति की हर चेष्टा निष्फल हो जाती है तो उस का मन धन कमाने से विरक्त हो जाता है तब वह भगवान् की शरण में जाता है तब भगवान् उस पर अपनी कृपा बरसाते हैं उन की कृपा से उसे परम सूक्ष्म अनन्त सच्चिदानन्द स्वरूप परब्रह्म की प्राप्ति होती है | भगवान् विष्णु की आराधना कठिन है इसलिए लोग उन के ही दूसरे रूप देवताओं की आराधना करते हैं जो जल्दी खुश हो कर अपने भगतों को साम्राज्य और लक्ष्मी दे देते हैं उसे पा कर वे प्रमादी और उन्मत हो जाते हैं और वर देने वाले को ही भूल जाते हैं और उन का तिरस्कार कर बैठते हैं ,इसी सन्दर्भ में एक प्राचीन कहानी है भगवान् शिव एक बार वृकासुर को वर दे कर संकट में पड़ गए थे |
वृकासुर शकुनी का पुत्र था | उस की बुद्धि बहुत बिगड़ी हुई थी एक दिन उस ने नारद जी को कहीं जाते हुए देख लिया और उन से पूछने लगा कि तीनों देवताओं ब्रह्मा,विष्णु और शिव में से कौन जल्दी प्रसन्न हो जाता है |नारद ने कहा तुम शिव जी की आराधना करो तुम्हारा मनोरथ जल्दी पूरा हो जाएगा वे थोड़े से प्रयास से ही प्रसन्न हो जाते हैं | रावण और वाणासुर ने भी उन की स्तुतियां की थी ,इसी से प्रसन्न हो कर उन्हें भी बहुत अधिक एश्वर्य दे दिया था | वे थोड़े से प्रयास से खुश हो जाते हैं लेकिन थोड़े से अपराध से क्रोधित भी हो जाते हैं |रावण ने कैलाश को उठाने की और बाणासुर ने नगर की रक्षा का भार लेने से अपने उपर संकट मोल ले लिया था |
नारद का यह उपदेश सुन कर वृकासुर केदार क्षेत्र में चला गया और अग्नि को भगवान शिव का मुख मान कर अपने शरीर का मांस काट काट कर हवन करने लगा | इस प्रकार कई दिन तक उपासना करने पर भी जब उसे शिव के दर्शन नहीं हुए तब उसे बड़ा दुःख हुआ अंत में उस ने अपने सर को कुल्हाड़ी से काट कर हवन करना चाहा ,जैसे हम लोग यदि कोई आत्महत्या करने जा रहा है तो उसे बचा लेते हैं वैसे ही शिव बहुत दयालु हैं वृकासुर के आत्महत्या करने से पहले अग्नि कुण्ड से प्रकट हुए और दोनों हाथों से उस के दोनों हाथ पकड़ लिए तथा गला काटने से रोक लिया और वृकासुर से कहा बस करो बस करो अपना मुह्मांगा वर मांग लो मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ इस लिए अपने शरीर को पीड़ा मत दो | इतना सुनते ही पापी वृकासुर ने समस्त प्राणियो को भयभीत करने वाला यह वर माँगा कि मैं जिस के सिर पर हाथ रख दूँ ,वहीं मर जाए | उस की यह याचना सुन कर शिव ने अनमने मन से हंस कर यह वर दे दिया |ऐसा वर दे कर उन्हों ने मानों सांप को अमृत पिला दिया | शिव से ऐसा वर मिलने पर उस के मन में लालसा हुई कि क्यों न मैं पार्वती को ही प्राप्त कर लूं और वर की परीक्षा लेने के लिए शिव के ही सिर पर हाथ रखने की कोशिश करने लगा | अब तो शिव को अपने दिए हुए वर से ही डर लगने लगा | वह अत्याचारी उन का पीछा करने लगा वे उस के डर से कांपने और पृथ्वी,स्वर्ग और चारों दिशाओं में भागने लगे वह उन के पीछे लगा रहा ,बड़े बड़े देवताओं का प्रयास शिव पर आये हुए इस संकट को टालने में असफल रहा अंत में शिव प्राकृतिक अन्धकार से परे परम प्रकाशमान वैकुण्ठ लोक में जहां भगवान् बिष्णु का निवास स्थान है उन की शरण में गए |एकमात्र वही स्थान है जहां सारे जगत को अभयदान मिलता है ,वैकुण्ठ में जा कर जीव को फिर लौटना नहीं पड़ता | भक्तभयहारी भगवान् ने जब देखा शिव तो बड़े संकट में हैं तो वह अपनी योगमाया से ब्रह्मचारी बन कर वृकासुर की और जाने लगे वे मुंज माला, काला मृग चर्म दंड और रुद्राक्ष माला धारण किये हुए थे ,उन के अंग अंग से ज्योति निकल रही थी ,वे हाथ में कुश लिए हुए थे उन्होंने वृकासुर को देख कर बड़ी नम्रता से झुक कर प्रणाम किया |
ब्रम्हचारी वेषधारी भगवान् ने वृकासुर से कहा आप बहुत थके लग रहे हो तनिक विश्राम कर लो ,यह शरीर तो सारे सुखों की जड है ,इसी से सारी कामनाएं पूर्ण होती हैं ,इसे कष्ट नहीं देना चाहिए |आप तो सब प्रकार से समर्थ हो इस समय आप क्या करना चाहते हैं मेरे सुनने लायक कोई बात हो तो बताइए | क्यों कि संसार में देखा जाता है कि लोग अपनी समस्याए दूसरों को बता कर अपना उद्देश्य पूरा कर लेते हैं | भगवान् के एक एक शब्द से अमृत बरस रहा था उन के ऐसा पूछने पर उस ने शिव से क्रमशः अपनी तपस्या ,वर प्राप्ति तथा शिव के पीछे भागने का उद्देश्य बता दिया |अच्छा ऐसी बात है ? भगवान् ने कहा मैं तो इस पर विश्वास नहीं करता ,आप तो जानते हैं दक्ष प्रजापति के श्राप से वे पिशाच भाव को प्राप्त हैं वह तो प्रेतों के सम्राट हैं ,दानवराज आप ने उन पर कैसे विश्वास कर लिया अगर आप उन को अब भी भगवान् मानते हैं तो उन के वर की झट से परीक्षा अपने सिर पर हाथ रख कर कर लो |यदि उन की बात असत्य निकले तो उसे मार डालो जिस से वह फिर झूठ न बोल सके | भगवान की ऐसी बातें सुन कर उस दानव की बुद्धि जाती रही ,उस ने भूल कर अपने सिर पर हाथ रख लिया | बस उसी क्षण उस का सिर फट गया और वह मर गया | इस प्रकार शिव पर आया संकट दूर हुआ |
भगवान् अनंत शक्तिओं के भण्डार हैं कोई अपराध कर के कैसे बच सकता है ,उन की एक एक शक्ति मन और बाणी की सीमा से परे है ,हम जो कर्म करते हैं उस का फल मिलना निश्चित है अछे का फल अच्छा और बुरे का फल बुरा मिलता है और इसी जन्म में मिलता है | भगवान् प्रकृति से अतीत स्वयं परमात्मा हैं | इति
