हिरण्याक्ष वध
श्रीमद्भागवत महापुराण के तृतीय स्कन्ध के १९ वें अध्याय में भगवान के वराह अवतार द्वारा हिरण्याक्ष के वध की परम पावन लीला का वर्णन है | यह कथा अधर्म पर धर्म की , अहंकार पर विनम्रता की और असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक है |
पूर्व कथा –
सृष्टि के आरम्भ में जय-विजय नाम के विष्णु के दो द्वारपाल थे |सनकादि ऋषियों के शाप के कारण उन्हें असुर योनी में जन्म लेना पड़ा | प्रथम जन्म में वे दिति के गर्भ से हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष के रूप में उत्पन्न हुए |
हिरण्याक्ष बड़ा ही बलशाली ,महापराक्रमी और वरदान प्राप्त था |उस ने अपनी शक्ति के मद में तीनों लोकों को जीत लिया |वह स्वर्ग के देवताओं को पराजित कर चुका था | एक दिन वह महासागर में गदा लेकर घूम रहा था और युद्ध के लिए योग्य योद्धा को खोज रहा था |उस ने वरुण देव को ललकारा | वरुण देव ने उस की शक्ति को पहचानते हुए कहा,” असुर राज युद्ध की कला में तुम्हारे योग्य इस समय केवल एक ही पुरुष हैं -वे हैं भगवान विष्णु | वे ही तुम्हारी युद्ध पिपासा को शांत कर सकते हैं|”
हिरण्याक्ष भगवान विष्णु को खोजने लगा |उसी समय वह पृथ्वी को रसातल में ले गया था | ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर भगवान ने वराह रूप धारण कर पृथ्वी का उद्धार किया था और उसे अपनी दाढ़ों पर धारण कर रसातल से बाहर ला रहे थे |
वराह भगवान और हिरण्याक्ष का आमना सामना –
रसातल में जब वराह भगवान अपनी थूथनी पर पृथ्वी को धारण कर ऊपर आ रहे थे ,तभी हिरण्याक्ष ने उन्हें देखा | उस ने अट्टहास करते हुए कहा -,” अरे वनचर,यह पृथ्वी तो रसातल वासियों की है |तू इसे कहाँ लिए जा रहा है ?तू तो मायावी है,योगियों के भेष में घूमता है |आज मैं तेरा वध करके अपने बन्धु बांधवों का संताप मिटाऊंगा |”
भगवान वराह ने पृथ्वी को जल के ऊपर स्थापित किया और उसे अपनी योगमाया से सुरक्षित कर दिया | पृथ्वी को अभय दान दे कर वे हिरण्याक्ष की और मुड़े | उस समय ब्रह्मा जी सहित सभी देवता आकाश से यह युद्ध देख रहे थे |
हिरण्याक्ष ने गदा से भगवान पर प्रहार किया |भगवान ने अपनी गदा से उस के प्रहार को रोक दिया |फिर दोनों में घौर गदा युद्ध आरम्भ हुआ |ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे दो पर्वत आपस में टकरा रहे हों |उन के गदा प्रहार से बिजली सी चमक उत्पन्न हो रही थी और दिशाएँ गूँज रही थीं |
घोर युद्ध –
शुकदेव जी परीक्षित से कहते हैं-हे राजन,वह युद्ध बड़ा ही भयंकर था|हिरण्याक्ष क्रोध से लाल आँखें कर के भगवान पर बार बार प्रहार कर रहा था |भगवान वराह अपनी लीला से कभी उस के बार को व्यर्थ कर देते ,तो कभी स्वयं पीछे हटने का अभिनय करते | देवता चिंतित हो गए कि भगवान इस प्रकार लीला क्यों कर रहे हैं |
ब्रह्मा जी ने भगवान से प्रार्थना की,” हे प्रभु, यह दुष्ट असुर संध्या काल से पूर्व मारा जाना चाहिए | संध्या के समय असुरों की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है | आप अपनी योग माया से इसे मोहित न करें और शीघ्र ही इस का वध करें |
हिरण्याक्ष मायावी भी था | उस ने अपनी माया से आंधी,पत्थरों की वर्षा और धूल का बबंडर उत्पन्न किया | समस्त दिशाओं में अन्धकार छा गया | देवता भयभीत हो गए |तब भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र का स्मरण किया और उस माया को क्षण भर में नष्ट कर दिया |
जब उस की माया विफल हो गई,तो वह पुन:गदा ले कर दौड़ा | उस ने भगवान के वक्ष पर प्रहार किया |भगवान तनिक भी विचलित नहीं हुए | उन्होंने अपनी गदा से हिरण्याक्ष की गदा को छिन्न भिन्न कर दिया और फिर एक जोरदार प्रहार उस की छाती पर किया |
हिरण्याक्ष वध –
अंत में भगवान वराह ने अपने पैर से हिरण्याक्ष को ठोकर मार कर पृथ्वी पर गिरा दिया और उस के कान की जड में एक थप्पड़ मारा | थप्पड़ खाते ही उस की आँखें पलट गईं,केश बिखर गए और वह रक्त वमन करता हुआ वायु रहित वृक्ष की तरह पृथ्वी पर गिर पड़ा |
उस के गिरते ही आकाश में दुदुभिंयाँ बजने लगीं | देवता भगवान वराह की जय जयकार करने लगे और उन पर पुष्पों की वर्षा करने लगे| ब्रह्मा जी ने कहा-“हे प्रभो,आप ने इस लोक पीड़ित असुर का वध करके सृष्टि का बड़ा उपकार किया है |”
हिरण्याक्ष का शरीर बड़ा ही तेजस्वी था | योगी जन उस की मृत्यु को भी आदर्श मानते हैं क्यों कि वह भगवान के हाथों मरा और अंत समय में भगवान का ही मुख देख रहा था |
इस प्रकार भगवान वराह ने हिरण्याक्ष का वध करके पृथ्वी को उस के अत्याचारों से मुक्त किया और जल के ऊपर स्थापित किया | यह लीला हमें सिखाती है कि जब जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है और सज्जनों पर अत्याचार होता है तब तब भगवान किसी न किसी रूप में अवतार ले कर धर्म की स्थापना करते हैं |
यह कथा केवल युद्ध की कथा नहीं है ,यह भक्ति की कथा है |हिरण्याक्ष भी भगवान के ही पार्षद थे ,अत: भगवान के हाथों मर कर वे पुन: अपने वैकुण्ठ धाम को प्राप्त हुआ |
बोलिए वराह भगवान की जय |
इति श्रीमद्भागवते महापुराण पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे हिरण्याक्ष बधो नामैकोनविशोSध्याय: ||१९ ||
लेखक -मदन लाल शर्मा
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