अष्टावक्र -6
लयात्मसातोपदेश
अहं वा सर्वभूतेषु सर्वभूतान्यथो मयि |इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहों लय: ||
मैं ही समस्त चराचर में व्याप्त हूँ और समस्त चराचर मुझ में समाहित है |अब मुझे ज्ञान हो गया है कि अब मैं ही सब हूँ और सब ही में मैं हूँ तो किस का त्याग और किस का ग्रहण ! यही लय है |
श्लोक-आकाशवदनन्तोSहं घटवत प्राकृतं जगत | इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहों लय: ||१||
अर्थ-मैं आकाश के समान अनन्त हूँ और यह सारा प्रकृतिजन्य जगत घड़े के समान है |यह ज्ञान है |इस ज्ञान में न तो जगत को त्याग करना है ,न उसे ग्रहण करना है बल्कि उसी में लय हो आना है |
विवेचना -यहाँ अष्टावक्र आकाश और घट का उदाहरण देते हैं | आकाश अनन्त ,असीम और सब को धारण करने वाला है ,जब कि घडा उसी आकाश के अन्दर बना हुआ एक छोटा सा सिमित आकार है |यह घडा फूट भी जाए तो आकाश में कोई फर्क नहीं पड़ता | वैसे ही आत्मा अनन्त आकाश के समान है और यह सारा संसार शरीर,मन, संबंध ,उसी से बना हुआ एक छोटा सा घडा है
अज्ञानी व्यक्ति घड़े को ही सब कुछ समझ कर उस की रक्षा में जीवन बिता देता है |ज्ञानी देखता है कि मैं तो आकाश हूँ | जब यह बोध होता है तो दो गलतियाँ छूट जाती हैं | पहली गलती -संसार से लड़ कर उस का त्याग करना ,भाग कर सन्यासी बन जाना |दूसरी गलती -संसार को ही सत्य मान कर पकड़ कर रखना | अष्टावक्र कहते हैं ,दोनों ही बंधन हैं |घड़े से न लड़ो ,न उस से चिपको | बस जान लो कि तुम आकाश हो,घडा तुम में है| जानने मात्र से लय हो जाती है |यह लय ही मुक्ति है |यह त्याग नहीं बोध है |
श्लोक-महोदधिरिवाहं स प्रपंचो विचीसSन्निभ: |इति ज्ञान तथैतस्य न त्यागो न ग्रहों लय: ||2||
अर्थ- मैं महासागर के समान हूँ और यह प्रपंच लहरों के समान है | यह ज्ञान है | इस का न त्याग है ,न ग्रहण है ,केवल इस में लय होना है |
विवेचना –
पिछले श्लोक में आकाश की स्थिरता थी,इस श्लोक में सागर की गतिशीलता है |सागर शांत भी है और चंचल भी |लहरें सागर से ही उठती हैं ,सागर में ही खेलती हैं और सागर में ही विलीन हो जाती हैं |लहर सागर से अलग नहीं है ,पर सागर लहर से बहुत बड़ा है |
हमारा जीवन भी ऐसा ही है आत्मा महासागर है और विचार ,सुख दुःख ,जन्म-मरण ,ये सब लहरें हैं |लहर को रोकने की कोशिश मत करो ,वह उठेगी गिरेगी | लहरों को रोकना ही संसार से त्याग की चेष्टा है और एक लहर को पकड़ कर रखने की कोशिश करना ही संसार को ग्रहण करना है |दोनों में दुःख है |
ज्ञानी लहरों को देखता है ,पर घवराता नहीं |वह जानता है मैं पानी हूँ,लहर नहीं,जब व्यक्ति अपने को लहर समझता है तो उसे टूटने का भय लगता है | जब अपने को सागर जान लेता है तो निर्भय हो जाता है |लहरों के रहते हुए भी सागर शांत रहता है इसी प्रकार ज्ञानी संसार के बीच रहता हुए भी शांत रहता है | उसे संसार छोड़ कर हिमालय नहीं जाना पड़ता |वह जहाँ है ,वही लहरों के साथ एकरूप हो कर ,उन्हें अपना ही रूप जान कर मुक्त रहता है |
श्लोक-अहं स शुक्तिसड़काशी रूप्यंवद विश्वकल्पना | इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहों लय; ||3||
अर्थ- मैं सीप के समान हूँ और यह सारा जगत मुझ में चांदी के समान कल्पित है |यह ज्ञान है |इस का न त्याग है ,न ग्रहण,केवल यह लय है |
विवेचना –
यह श्लोक वेदान्त की सब से प्रसिद्ध युक्ति है | सीप में चांदी का भ्रम | संध्या के धुंधले प्रकाश में पड़ी सीप में कभी कभी चांदी जैसी चमक दिखती है |चांदी वहां है ही नहीं ,केवल कल्पना है ,आभास है पर जब तक ज्ञान नहीं होता ,तब तक सत्य लगती है |ज्ञान होते ही पता चलता है कि चांदी कभी थी ही नहीं ,सदा से सीप ही थी |
अष्टावक्र कहते हैं ,आत्मा वह सीप है और सारा सुन्दर असुन्दर जगत उस पर आरोपित चांदी है| संसार असत्य नहीं कि है ही नहीं ,पर वह वैसा नहीं है जैसा दिखता है |वह कल्पना है ,मन का प्रक्षेपण है |
यह जब समझ आती है तो आप क्या करेंगे ? क्या आप सीप को फेंक देंगे ?नहीं,क्यों कि चांदी तो थी ही नहीं ,फेंकना क्या है ? क्या आप चांदी को सम्भाल कर रखेंगे ? वह भी नहीं,क्यों कि वह है ही नहीं | बस भ्रम टूट जाता है |इसी को लय कहते हैं |संसार को मिथ्या जान कर उस से नफरत करना भी अज्ञान है |ज्ञानी संसार से लड़ेगा नहीं ,वह हँसेगा कि मैं भी कितना सुन्दर धोखा खाता रहा ,यह हंसी ही लय है |कल्पना का अंत होते ही जो शेष बचता है ,वही शुद्ध मैं हूँ |
श्लोक- अहं वा सर्वभूतेषु सर्वभूतान्यथो मयि | इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहों लय: ||४||
मैं समस्त प्राणियों में स्थित हूँ और समस्त प्राणी मुझ में स्थित हैं |यह ज्ञान है |इस का न त्याग है ,न ग्रहण,केवल लय होना है |
विवेचना –
पिछले तीन श्लोकों में जगत को अपने से छोटा ,अपनी लहर और अपनी कल्पना बताया अब इस अंतिम श्लोक में अष्टावक्र एकता की पराकाष्ठा पर ले जाते हैं |अब द्वैत बिलकुल मिट गया |मैं सब में हूँ और सब मुझ में हैं |
यह दो तरफा सत्य है ,जैसे माला के हर धागे में मनका है और सारे मन के धागे में हैं| जैसे सोने के हर गहनें में सोना है ,और सारा सोना गहनों| में ही अभिव्यक्त है |जब तक मैं देह हूँ ,तब तक लगता है मैं अलग हूँ | जब बोध होता है कि मैं चेतना हूँ ,तो पता चलता है ,वही चेतना कुते,विल्ली में,शत्रु में मित्र में भी है | हर बोध अर्थात ज्ञान के बाद क्या बचता है त्यागने और पकड़ने को ? किसी से घृणा कैसे कर सकते हैं जब वह आप में ही है ? किसी से राग कैसे कर सकते हैं जब आप पहले से ही उस में हैं ? राग द्वेष दोनों की जड अलगाव है |एकत्व के बोध से दोनों गिर जाते हैं
इसलिए अष्टावक्र कहते हैं,इस ज्ञान को पकड़ना मत ,इसे भी एक विचार मत बनाओ | बस इस में लय हो जाओ |जीते जी सब में अपने को और अपने में सब को देखना ही जीवन मुक्ति है | यही षष्टम प्रकरण का सार है |
इति षष्टम प्रकरण
मदन लाल शर्मा
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