संबिधान सभा के सभापति और अध्यक्ष के भाषण की प्रासंगिकता
भारत में व्यबस्था की स्थिरता इस बात पर निर्भर करती है कि उस का संचालन करने वाले किस तरह के हैं | संचालनकर्ताओं की प्राथमिकता स्वार्थ है या परमार्थ | जब धन और सम्पदा के प्रति इच्छा बढ़ती है ,तब स्वार्थ प्रबल हो उठते हैं |व्यक्ति जैसे भी हो उन संस्थाओं पर कब्जा करने की कोशिश करता है जो उसे अधिकारसम्पन्न बनाती हैं ,ताकत देती हैं ,जिस से उस का हित हो रहा हो | आजाद भारत का संविधान स्वीकृत हो जाने के बाद प्रारूप समिति के सभापति डाक्टर भीमराव अम्बेडकर और संविधान सभा के अध्यक्ष डा० राजेन्द्र प्रसाद ने २५ तथा २६ नवम्बर १९४९ को भाषण देते हुए चेतावनी भी दी थी और सावधानी रखने का आग्रह भी किया |डा० अम्बेडकर ने कहा –
“मैं महसूस करता हूँ कि संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों ना हो ,यदि वे लोग जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाए ,खराब निकलें तो निश्चित रूप से संविधान भी खराब सिद्ध होगा |दूसरी और संविधान चाहे कितना भी खराब क्यों न हो यदि वे लोग जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाये ,अच्छे हों तो संविधान अच्छा सिद्ध होगा | संविधान पर अमल केवल संविधान के स्वरूप पर निर्भर नहीं करता | संविधान केवल विधायिका,कार्यपालिका और न्यायपालिका जैसे राज्य के अंगों का प्रावधान कर सकता है |राज्य के उन अंगों का संचालन लोगों पर तथा उन के द्वारा अपनी आकांक्षाओं तथा अपनी राजनीती की पूर्ति के लिए बनाये जाने वाले राजनीतिक दलों पर निर्भर करता है | कौन कह सकता है कि भारत के लोगों तथा उन के राजनीतिक दलों का व्यवहार कैसा होगा ? जातियों तथा सम्प्रदायों के रूप में हमारे पुराने शत्रुओं के अलावा विभिन्न तथा परस्पर विरोधी विचार धारा रखने वाले राजनीतिक दल बन जायेंगे |क्या भारतवासी देश को धर्म से उपर रखेंगे या धर्म को देश के उपर रखेंगे ? मैं नहीं जानता | लेकिन एक बात निश्चित है कि यदि राजनीतिक दल अपने धर्म को देश से उपर रखेंगे तो हमारी स्वतन्त्रता एक बार फिर खतरे में पड़ जायेगी और संभवतया हमेशा के लिए खत्म हो जाए | हम सभी को इस संभाव्य घटना का दृढ निश्चय के साथ प्रतिकार करना चाहिए |हमें अपनी आजादी की खून के आखिरी कतरे के साथ रक्षा करने का संकल्प करना चाहिए |
यह विश्वास करते हुए की संविधान देश की जरूरतों को अच्छी तरह से पूरी करेगा ,डा० राजेन्द्र प्रसाद ने कहा ,”यदि लोग जो चुन कर आयेंगे योग्य ,चरित्रवान और ईमानदार हुए तो दोषपूर्ण संविधान को सर्वोतम बना देंगे यदि उन में इन गुणों का अभाव हुआ तो संविधान देश की कोई भी मदद नहीं कर सकता | आखिरकार एक मशीन की तरह संविधान भी निर्जीव है |इस में प्राणों का संचार उन व्यक्तिओं के द्वारा होता है ,जो इस पर नियन्त्रण करते हैं तथा इसे चलाते हैं और भारत को इस समय ऐसे लोगों की जरूरत है , जो ईमानदार हों,और देश हित को सर्वोपरि रखें | हमारे जीवन में विघटनकारी तत्व उत्पन्न हो रहे हैं | हम में साम्प्रदायिक अन्तर है ,जातिभूत अन्तर है,भाषागत अन्तर है ,प्रांतीय अन्तर है | इस के लिए दृढ चरित्र वाले लोगों की,ऐसे लोगों की जरूरत है जो छोटे छोटे समूहों तथा क्षेत्रों के लिए देश के व्यापक हितों का बलिदान न दें और उन पूर्वाग्रहों के उपर उठ सकें जो इन अन्तरों के कारण उत्पन्न होते हैं | हम केवल यही आशा कर सकते हैं कि देश में ऐसे लोग प्रचुर संख्या में सामने आयें |’
इतिहास -पुराणों में ऐसे काल खण्डों का वर्णन है जब समाज -व्यबस्था का संचालन गलत हाथों में रहा जिस के परिणाम स्वरूप समाज में पाशविक अवम राक्षसी प्रवृतियों का वर्चस्व कायम हुआ | जब राजसत्ता धर्मप्राण और न्यायप्रिय शासकों के हाथों में रही तो समाज सुचारू रूप से चलता रहा | अम्बेडकर ने जिन पुराने शत्रुओं का जिक्र किया था उन का वर्चस्व आज बढ़ रहा हैं इस लिए हम जो प्रतिनिधि चुन कर भेजें वह ईमानदार,समाजसेवी ,पढेलिखें ,निस्वार्थी और चरित्रवान हों |
