कोई परमात्मा नहीं है केवल आडम्बर है ?
साकारमनृत् विद्धि निराकारं तु निश्चलं |
एततत्वोपदेशेन न पुनर्भवसंभव: ||
आत्मा के साकार रूप को वास्तविक मत समझ | उस का रूप तो निराकार है,ज्ञान पूर्ण ,अटल और अपरिवर्तनशील है |जिस ने भी इस एक तत्व उपदेश को हृदय में धारण कर लिया ,वह जन्म-जन्मांतर के बंधन से मुक्त हो गया अर्थात फिर उस का पुनर्जन्म संभव नहीं होता |
यथैवादर्शमध्यस्थे रूपेSन्त: परितस्तु स: |
तथेवाSस्मिन शरीरेSन्त: परित: परमेश्वर: ||
जिस प्रकार शीशे में अपना प्रतिबिंब देखने पर जो बाहर है वही अन्दर दिखाई पड़ता है ,ठीक उसी प्रकार आत्मा अर्थात परमात्मा है | जो तुम बाहर हो वही तुम अन्दर हो | आत्मा रुपी परमात्मा सभी शरीरधारीयों के अंदर बाहर विराजमान है |
आत्मा का कोई भी साकार रूप नहीं है न ही तो परमात्मा का कोई साकार रूप है | आत्मा तो निराकार है उस का कोई रंग रूप नहीं है | वास्तव में कोई ईश्वर है ही नहीं | जो भी साधू संत यह दावा करते हैं की हम ने उसे देखा है उस ने मुझे वरदान दिया है ,उस का रंग रूप हमारे जैसा है वह सब झूठ कहते हैं | बड़े बड़े धर्माचार्य भगवान् के होने का दावा करते हैं वह केवल लोगों को भ्रमित करते है ,साकार वह होता जिस का कोई रंग रूप हो ,साकार का शरीर होता है उस की उम्र होती है अगर उम्र है तो उम्र की सीमा होती है उस सीमा के बाद देह त्याग करना पड़ता है | फिर वह अटल अमर कैसे हुआ | ईश्वर कोई जन्म नहीं लेता वह तो जन्म मरण से परे है | कुछ लोग साकार भगवान् को मानते हैं भगवान अपने भगतों का उद्धार करने के लिए अवतार लेते हैं ,अपनी लीलाओं से लोगों का मार्गदर्शन करते हैं | यदि वह साकार है तो उस का शरीर पंचतत्व से बना होना चाहिए ,यदि उस का शरीर भौतिक है तो वह नाशवान है क्यों की भौतिक वस्तु नाशवान होती है | उस की समय अवधि होती है ,जिस के पूर्ण होने पर वह नष्ट हो जाती है | साधू संत तपश्या करते हैं लेकिन उन्हें कुछ भी नहीं मिलता ,फिर लोगों को क्या बतायेंगे की तपस्या क्यों की उस का फल क्या मिला ,इसलिए काल्पनिक कहानिये सुनाई जाती हैं यह सिद्ध करने के लिए की मेरी तपस्या सफल रही है |
आत्मा और परमात्मा निराकार है | शास्त्रों के अनुसार भी ईश्वर का स्वरूप निराकार और अनंत है |ईश्वर के आस्तित्व को सावित और ख़ारिज करने के लिए कोई भौतिक प्रमाण मौजूद नहीं है इस का अर्थ है ईश्वर नहीं है |वेद भी ईश्वर को निराकार और अव्यक्त मानते हैं | ब्रम्ह निराकार ,सर्वव्यापी ,उर्जा जो सतचित आनंद है |आत्मा ज्ञान स्वरूप है और ज्ञान ही प्रकाश है और इस प्रकाश का किसी अन्य में कोई आस्तित्व नहीं है | आत्मा एक प्रकाश स्वरूप है जिस को किसी प्रकार की उत्पति या आधार की जरूरत नहीं होती | जो हमारे अंदर आत्मा है वही बाहर है अर्थात आत्मा और परमात्मा एक ही है | अर्थात एक चेतना है जो सर्व व्यापी है सर्व कालिक और वही सर्वपरमेश्वर है | उस की पूजा अर्चना उस को प्रसन्न करना होम यग्य सब बेकार हैं | अर्थात जो है ही नहीं उसे प्रसन्न कैसे किया जा सकता है यह सब आडम्बर है | आत्म स्वरूप को जान कर ही इस संसार से अपना बेडा पार किया जा सकता है जो अंदर है वही बाहर है जिस ने उसे सर्वत्र मान लिया वह उसे प्राप्त कर गया |
