श्री कृष्ण की लीला के पात्र गोपिकाये कौन थीं

भगवान की लीला पर विचार करते समय यह बात स्मरण रखनी चाहिए कि भगवान का लीलाधाम ,भगवान के लीलापात्र ,भगवान का लीलाशरीर और उन की लीला प्राकृत नहीं होती | भगवान में देह-देही का भेद नहीं होता | महाभारत में आया है –

न भूतसंघ संस्थानों देवस्य परमात्मन: |यो वेति भौतिकं देहं कृष्णस्य परमात्मन : ||

स सर्वस्माद वहिश्कार्य: श्रोतस्मार्तबिधानत:|मुखं तस्यावलोक्यापी सचैल:स्नानमाचरेत ||

“परमात्मा का शरीर पंचतत्व से बना हुआ नहीं होता | जो लोग श्री कृष्ण परमात्मा के शरीर को भौतिक जानते और मानते हैं उस का समस्त श्रोत -स्मार्त कर्मों से बहिष्कार कर देना चाहिए अर्थात उस का किसी भी शास्त्रीय कर्म में अधिकार नहीं है || यहाँ तक की उस का मुख देखने पर वस्त्र सहित स्नान करना चाहिए |”

श्रीमद्भागवत में ही ब्रम्हाजी ने भगवान् की स्तुति करते हुए कहा है -अस्यापि देव वपुषो मदनुग्रहस्य स्वेच्छामयस्य न तु भूतमयस्य कोअपि ||

” आप ने मुझ पर कृपा करने के लिए ही यह स्वेच्छामय सच्चिदानन्द स्वरूप प्रकट किया है ,यह पंचतत्व कदापि नहीं है |”

इस से यह स्पष्ट है कि भगवान् का सभी कुछ अप्राकृत होता है | इसी प्रकार यह माखन चोरी की लीला भी अप्राकृत -दिव्य ही है |

यदि भगवान के नित्य परम धाम में अभिन्न रूप से नित्य निवास करने वाली नित्यसिद्धा गोपियों की दृष्टि से न देख कर केवल साधनसिद्धा गोपियों की दृष्टि से देखा जाए तो भी उन की तपस्या इतनी कठोर थी ,उन की लालसा इतनी अनन्य थी,उन का प्रेम इतना व्यापक था और उन की लग्न इतनी सच्ची थी कि प्रेमरसमय भगवान् उन की इच्छानुसार उन्हें सुख पहुँचाने के लिए माखन चोरी की लीला करके उन की इच्छित पूजा ग्रहण करें ,चीरहरण करके उन के व्यबधान का पर्दा उठा दें और लीला करके उनको दिव्य सुख पहुंचायें तो कोई बड़ी बात नहीं है |

भगवान की नित्यसिद्धा गोपियों के अतिरिक्त बहुतसी ऐसी गोपियाँ और थीं ,जो अपनी महान साधना के फलस्वरूप भगवान की मुक्तजन -वांछित सेवा करने के लिए गोपियों के रूप में अवतीर्ण हुईं थी | उन में से कुछ पूर्व जन्म में देवकन्याएँ थी ,कुछ श्रुतियां थीं ,कुछ तपस्वी ऋषि थे और कुछ अन्य भगतजन | इन की कथाएं बिभिन्न पुराणों में मिलती हैं | श्रुतिरूपा गोपियाँ ,जो नेति नेति के द्वारा निरन्तर परमात्मा का वर्णन करते रहने पर भी उन्हें साक्षात रूप से प्राप्त नहीं कर सकती ,गोपियों के साथ भगवान् के दिव्य रसमय बिहार की बात जान कर गोपियों की उपासना करती हैं और अंत में स्वयं गोपी रूप में परिणत हो कर भगवान् श्री कृष्ण को साक्षात अपने प्रियतममय से प्राप्त करती हैं |

भगवान के रामावतार में उन्हें देख कर मुग्ध होने वाले -अपने आप को उन के स्वरूप सौन्दर्य पर न्योछावर कर देने वाले सिद्ध ऋषिगन ,जिन की प्रार्थना से प्रसन्न हो कर भगवान ने उन्हें गोपी हो कर प्राप्त करने का वर दिया था , ब्रज में गोपीरूप से अवतीर्ण हुए थे |इस के अतिरिक्त मिथिला की गोपी,कोसल की गोपी,अयोध्या की गोपी ,पुलिन्द गोपी,रमाबैकुंठ ,श्वेतद्विप आदि की गोपियाँ और जालंधरी गोपी आदि गोपियों के अनेकों यूथ थे,जिन की बड़ी तपस्या कर के भगवान् से वरदान पा कर गोपी रूप में अवतीर्ण होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था |पद्मपुराणके पातालखण्ड में बहुत से ऐसे ऋषियों का वर्णन है,जिन्होंने बड़ी कठिन तपस्या आदि कर के अनेकों कल्पों के बाद गोपिस्वरूप को प्राप्त किया था उन में से कुछ के नाम निम्नलिखित हैं-

१. एक उग्रतपा नाम के ऋषि थे |वे अग्निहोत्री और दृढव्रती थे ,उन की तपस्या अदभुत थी |उन्होंने पंचदशाक्षरमन्त्र का जाप और रासोंन्मत नवकिशोर श्यामसुंदर श्री कृष्ण का ध्यान किया था |सौ कल्पों बाद वे सुनन्द नामक गोप की कन्यां सुनन्दा हुए |

2.एक सत्यतपा नाम के मुनि थे | वे सूखे पतों पर रह कर दशाक्षर मन्त्र का जाप और श्री राधाजी के दोनों हाथ पकड़ कर नाचते हुए श्री कृष्ण का ध्यान करते थे | दस कल्प के बाद वे सुभद्र नामक गोप की कन्यां ‘सुभद्रा हुए |

3.हरीधामा नाम के एक ऋषि थे | वे निराहार रह कर क्लीं काम बीज से युक्त विंशाक्षरी मन्त्र का जाप करते थे और माधवी मन्डप में कोमल कोमल पतों की शय्या पर लेटे हुए युगल-सरकार का ध्यान करते थे |तीन कल्प के पश्चात वे सारंग नामक गोप के घर रंगवेणी नाम से अवतीर्ण हुए |

४.जाबाली नाम के एक ब्रह्मज्ञानी ऋषि थे ,उन्होंने एक बार विशाल वन में विचरते विचरते एक जगह एक बहुत बड़ी बाबली देखी ,उस के पश्चिम तट पर बड के नीचे एक तेजस्विनी युवती स्त्री कठोर तपस्या कर रही थी वह बड़ी सुन्दर थी | उस का वायां हाथ अपनी कमर पर था और दहिने हाथ से वह ज्ञान मुद्रा धारण किये हुए थी |जाबालि के बड़ी नम्रता के साथ पूछने पर उस तापसी ने बताया -मैं ब्रह्मबिद्या हूँ ,जिसे बड़े बड़े योगी ढूंडा करते हैं | मैं श्री कृष्ण के चरण कमलों की प्राप्ति के लिए इस घौर वन में उन पुरुषोतम का ध्यान करती हुई दीर्घ काल से तपस्या कर रही हूँ |मैं ब्रम्हानंद से परिपूर्ण हूँ और मेरी बद्धि भी उसी आनंद में परितृप्त है ,परन्तु श्री कृष्ण का प्रेम मुझे अभी प्राप्त नहीं हुआ हैं इसलिए मैं अपने को शून्य देखती हूँ | ब्रह्मज्ञानी जबाली ने उस के चरणों में गिर कर दीक्षा ली और फिर भगवान का ध्यान करते हुए वे एक पैर से खड़े हो कर बड़ी कठोर तपस्या करते रहे |नौ कल्पों बाद प्रचंड नामक गोप के घर वे चित्रगंधा के रूप में प्रकट हुए |

५. कुशध्वज नामक ऋषि पुत्र शुचिश्रवा और देवतत्वज्ञ थे | उन्होंने शीर्षासन कर के ह्रीं हंस मन्त्र का जप करते हुए और सुंन्दर कन्दर्प -तुल्य गोकुल वासी दस वर्ष की उम्र के भगवान् श्री कृष्ण का ध्यान करते हुए घौर तपस्या की |कल्प के बाद वे ब्रज में सुधीर नामक गोप के घर उत्पन्न हुए |

इसी प्रकार और भी बहुत सी गोपियों के पूर्व जन्म की कथाएं प्राप्त होती हैं |भगवान के लिए इतनी तपस्या कर के इतनी लग्न के साथ कल्पों तक साधना कर के जिन त्यागी भगवान् के प्रेमियों ने गोपियों का तनमन प्राप्त किया था ,उन की अभिलाषा पूर्ण करने के लिए ,उन्हें आनंद दान करने के लिए यदि भगवान उन की मनचाही लीला करते हैं तो इस में आश्चर्य और अनाचार की कौन सी बात है ,रसलीला के प्रसंग में स्वयं भगवान् ने गोपियों से कहा है -गोपियों ,तुम ने लोक और परलोक के सारे बन्धनों को काट कर मुझ से निष्कपट प्रेम किया है ,यदि मैं तुम से प्रत्येक के लिए अलग अलग अनंत काल तक जीवन धारण कर के तुम्हारे प्रेम का बदला चुकाना चाहूँ तो भी नहीं चूका सकता | मैं तुम्हारा ऋणीही रहूँगा | तुम मुझे अपने साधू स्वभाव से ऋण रहित मान कर और भी ऋणी बना दो ,यही उत्तम है | सर्वलोकमहेश्वर भगवान् श्री कृष्ण स्वयं जिन महाभागा गोपियों के ऋणी रहना चाहते हैं ,उन की इच्छा ,इच्छा से पूर्व ही भगवान् पूर्ण कर दे ,यह तो स्वभाविक ही है |

बिचार कर के देखिये गोपियों के मन की स्थिति क्या थी -गोपियों का तन मन धन सभी कुछ प्राण प्रीतम श्री कृष्ण का था | वे संसार में जीती थीं श्री कृष्ण के लिए ,घर में रहती थीं श्री कृष्ण के लिए ,और घर का काम करती थी श्री कृष्ण के लिए उन की निर्मल बुद्धि में श्री कृष्ण के इलावा अपना कुछ था ही नहीं | श्री कृष्ण के लिए ही ,श्री कृष्ण को सुख पहुँचाने के लिए ही ,श्री कृष्ण की निज सामग्री से ही श्रीकृष्ण को पूज कर -श्री कृष्ण को सुखी देख कर वे सुखी होती थीं | प्रात: काल निंद्रा टूटने के समय से लेकर रात को सोने तक वे जो कुछ करती थीं ,सब श्री कृष्ण के लिए ही करती थीं |स्वप्न और सुषुप्ति दोनों में ही वे श्रीकृष्ण की मधुर और शांत लीला देखती और अनुभव करती थीं | रात को दहीं जमाते समय श्यामसुन्दर की माधुरी छवि का ध्यान करती हुई प्रेम मयी प्रत्येक गोपी यह इच्छा करती थी कि मेरा दहीं सुंदर जमे ,श्री कृष्ण के लिय्रे उसे बिलों कर मैं बढिया सा और बहुत सा माखन निकालूं और उसे उतने ही ऊँचे छींके पर रखूं ,जितने पर श्रीकृष्ण के हाथ आसानी से पहुंच सकें |फिर श्री कृष्ण अपने सखाओं के साथ लेकर हंसते और क्रीडा करते हुए घर में आयें ,माखन लूटें और अपने सखाओं और बंदरों को लुटाएं ,आनंद मत हो कर मेरे आंगन में नाचें और मैं किसी कोने में छिप कर इस लीला को अपनी आँखों से देख कर जीवन को सफल करु और फिर अचानक ही पकड़ कर हृदय से लगा लूँ | सूरदास जी ने लिखा है –

मैया री मोहि माखन भावे | जो मेवा पकवान कहती तू, मोहि नही रूचि आवे ||

ब्रज -जुवती इक पाछै ठाढ़ी ,सुनत स्याम की बात |मन मन कहति कबहूँ अपने घर ,देखौ माखन खात ||

बैरे जाई मथनिया के ढिग,मैं तब रहों छपानी| सूरदास प्रभु अंतरजामी ,ग्वालिनी -मन की जानी ||

एक दिन श्याम सुंदर कह रहे थे ,मैया मझे माखन बहुत भाता है ,तू मेवा पकवान के लिए कहती है ,परन्तु मुझे तो वे रुचते ही नहीं |वहीं पीछे एक गोपी खड़ी श्यामसुन्दर की बात सुन रही थी | उस ने मन ही मन सोचा कि कब मैं इन्हें अपने घर माखन खाते देखूंगी ,ये मधानी के पास बैठेंगे ,तब मैं छिप कर रहूंगी | प्रभु तो अन्तर्यामी हैं ,गोपी के मन की जान गये और उस के घर पहुंचे तथा उस के घर का माखन खा कर उसे सुख दिया -गये श्याम तिहिं ग्वालिनी कै घर | उसे इतना आनंद हुआ कि वह फूली न समायी | वह खशी से छक कर फूली फूली फिरने लगी | आनंद उस के ह्रदय में समा नहीं रहा था |सहेलीयों ने पूछा -अरी,तुझे कहीं कुछ पड़ा धन मिल गया क्या ?वह तो यह सुन कर और भी प्रेमविहिलहो गई |उस का रोम रोम खिल उठा ,वह गद गद हो गई ,मुहं से बोली नहीं निकली | सखियों ने कहा -ऐसी क्या बात है ,हमें सुनाती क्यों नहीं ? हमारे तो शरीर ही दो हैं ,हमारा जी तो एक ही है – हम तुम दोनों एक ही रूप हैं |भला ,हम से छिपाने की कौन सी बात है ? तब उस के मुहं इतना ही निकला -मैंने आज अनूप रूप देखा है | बस,फिर बाणी रूक गयी और प्रेम के आंसू बहने लगे ,सभी गोपियों की यही दशा थी |

रातों गोपियाँ जाग जाग कर प्रात:काल होने की राह देखतीं | उन का मन श्री कृष्ण में लगा रहता |प्रात:काल जल्दी जल्दी दहीं मथ कर ,माखन निकाल कर छींके पर रखती ,कहीं श्री कृष्ण आ कर लौट न जाएँ ,इसलिए सब काम छोड़ कर वे सब से पहले यही काम करतीं और श्यामसुन्दर की प्रतीक्षा में व्याकुल होती हुई मन ही मन सोचतीं -आज प्राणप्रियतम क्यों नहीं आये ? इतनी देर क्यों हो गयी ? क्या इस दासी का घर पवित्र न करेंगे ?क्या आज मेरे इस तुच्छ माखन का भोग लगाकर स्वयं सुखी हो कर मुझे सुख न देंगे ? कहीं यशोदा मैया ने तो नहीं रोक लिया ? उन के घर में तो नौ लाख गौएँ हैं | माखन की क्या कमी है मेरे घर तो वे कृपा कर के ही आते हैं ? इन्हीं बिचारों में आंसू बहाती हुई गोपी क्षण क्षण में दौड़ कर दरवाजे पर जाती ,लाज छोड़ कर रास्ते की और देखती ,सखियों से पूछती | एक एक निमेष उस के लिए युग समान हो जाता |ऐसी भाग्यवती गोपियों की मन:कामना भगवान् उन के घर जा कर पूर्ण करते |

सूरदास कहते है –

प्रथम करी हरि माखन चोरी |ग्वालिनि मन इच्छा करि पूरन ,आपु भजे ब्रज खोरी ||

मन में यहै बिचार करत हरि, ब्रज घर घर सब जाऊं | गोकुल जन्म लियो सुख कारण ,सब के माखन खाऊं ||

बालरूप जसुमति मोहिं जानै ,गोपिनि मिलि सुख भोग | सूरदास प्रभु कहत प्रेम सौ ये मेरे ब्रज लोग ||

अपने निज जन ब्रज वासियों को सुखी करने के लिए ही तो भगवान् गोकुल पधारे थे |माखन तो नन्द बाबा के घर पर कम न था |लाख लाख गौएँ थीं वे जितना चाहें खाते परन्तु वे तो केवल नन्द बाबा के ही नहीं ,सभी ब्रज वासियों के अपने थे ,सभी को सुख देना चाहते थे | गोपियों की लालसा पूरी करने के लिए ही वे उन के घर जाते और चुरा चुरा कर माखन खाते |यह वास्तव में चोरी नहीं,यह तो गोपियों की पूजा भगवान् के द्वारा स्वीकार करना था |भगवान् भक्त की पूजा स्वीकार कैसे न करें ?

माखन चोरी का रहस्य न जानने के कारण लोग इसे आदर्श के विपरीत कहते हैं |उन्हें पहले समझना चाहिए चोरी क्या होती है ,वह किस की होती है और कौन करता है | चोरी उसे कहते हैं जब किसी दूसरे की चीज ,उस की इच्छा के विरूद्ध ,उस के अनजाने और आगे भी वह न जान पाए ऐसी इच्छा रख कर ली जाती है | भगवान् श्री कृष्ण गोपियों के घर से माखन लेते थे उन की इच्छा से ,गोपियों के अनजाने नहीं -उन की इच्छा से ,उन के देखते देखते और उन के सामने ही दौड़ कर निकल जाते थे | दूसरी महत्व पूर्ण बात कि संसार में या संसार के बाहर ऐसी कौन सी वस्तु है ,जो भगवान् की नहीं है वे किस की चोरी कर सकते हैं ?चोर तो वास्तव में वह लोग हैं ,जो भगवान् की वस्तु को अपना मान कर ममता में फंसे रहते हैं और दंड के पात्र बनते हैं | यह माखन चोरी नहीं थी बल्कि भगवान् की दिव्य लीला थी | वास्तव में गोपियों ने प्रेम की अधिकता से ही भगवान् के प्रेम का नाम चोर रख दिया था , क्यों कि वे उन के चित चोर तो थे ही |

साभार -श्रीमद भागवत दशम स्कन्ध –

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