कर्दम मुनि की तपस्या और वर प्राप्ति
श्रीमद्भागवत महापुराण के तृतीय स्कन्ध के इक्कीसवें अध्याय में सृष्टि के विस्तार की अत्यंत पावन कथा है |इस अध्याय को मनु-कर्दम संवाद के नाम से भी जाना जाता है | यह कथा त्याग, तपस्या और गृहस्थ धर्म और भगवान की कृपा का अद्भुत संगम है |
विदुर और मैत्रेय संवाद का प्रसंग –
पिछले अध्याय में विदुर जी ने मैत्रेय ऋषि से सृष्टि रचना का वृतान्त सुना अब उन के मन में जिज्ञासा हुई कि ब्रह्मा जी के मानस पुत्र ने किस प्रकार सृष्टि का विस्तार किया |
मैत्रेय ऋषि कहते हैं -हे विदुर,ब्रह्मा जी ने अपने पुत्र मरीचि आदि ऋषियों को सृष्टि रचना का आदेश दिया और स्वयं भी तप में लीन हो गए |इसी समय ब्रह्मा जी के हृदय से एक तेजस्वी पुत्र का प्रादुर्भाव हुआ,जिस का नाम कर्दम प्रजापति था |
ब्रह्मा जी ने कर्दम जी से कहा -पुत्र मैंने तुम्हें सृष्टि विस्तार के लिए उत्पन्न किया है | तुम मेरी आज्ञा से प्रजा की बृद्धि करो और भगवान हरि की आराधना करते हुए गृहस्थ धर्म का पालन करो |पिता की आज्ञा को शिरोधार्य कर कर्दम मुनि तपस्या करने निकल पड़े |
कर्दम ऋषि की दस हजार वर्षों की कठोर तपस्या –
कर्दम ऋषि सरस्वती नदी के पवित्र तट पर स्थित विन्दुसर नामक तीर्थ में पहुंचे |वह स्थान आज भी गुजरात में सिद्धपुर के निकट माना जाता है | वहां उन्होंने दस हजार वर्षों तक अत्यंत कठोर तपस्या की |
उन की तपस्या का स्वरूप क्रियायोग प्रधान था | वे मन को एकाग्र कर,इन्द्रियों को वश में रख कर.केवल भगवान विष्णु के ध्यान में लीन रहते थे वे केवल वायु पी कर, कभी जल पी कर,कभी निराहार रह कर भगवान कमलनाथ का चिन्तन करते थे |
शास्त्र में कहा गया है -तत:स्माधियुक्तेंन क्रियायोगेन: |सम्प्रपदे हरि भक्त्या प्रपन्नवरदाशुषम ||
अर्थात समाधि क्रियायोग से युक्त हो कर कर्दम जी ने शरणागतों को शीघ्र वर देने वाले हरि को भक्ति से प्राप्त कर लिया | उन की अनन्य भक्ति से प्रसन्न हो कर भक्त वत्सल भगवान गरुड पर सवार हो कर आकाश में प्रकट हुए |
भगवान के दिव्य स्वरूप का दर्शन –
भगवान का वह स्वरूप अत्यंत मनमोहक था |उन का शरीर शुद्ध सत्वमय ,मेघ के समान श्याम ,सूर्य के समान तेजस्वी था |गले में श्वेत कमल और उप्पल की माला,सिर पर किरीट,कानों में कुण्डल ,चार भुजाओं में शंख ,चक्र,गदा,और श्वेत कमल लिए हुए थे | उन के मुख पर मंद मंद मुसकान थी और नेत्र करूणा से भरे थे | वे गरुड के कंधे पर चरण कमल रखे हुए विराजमान थे |
ऐसे दिव्य स्वरूप को देख कर कर्दम जी प्रेम से गदगद हो गए |उन्होंने साष्टांग प्रणाम किया और गदगद बाणी में भगवान की स्तुति करने लगे |
कर्दम जी ने कहा,”हे प्रभु,आप शरणागतों के दुखहर्ता हैं| मैं आप की माया से मोहित हो कर गृहस्थ सुख की कामना करता हूँ ,यह भी आप की ही प्रेरणा है |यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं तो मुझे ऐसी अनुपम पत्नी प्रदान करें जो गृहस्थ धर्म के पालन में मेरी सहायिका हो और जिस से आप के अंश से पुत्र रूप में आप स्वयं अवतार लें |
भगवान ने मधुर बाणी में कहा ,” हे,कर्दम,तुम्हारे हृदय की बात मैं जानता हूँ |मेरी प्रेरणा से ही तुम गृहस्थ में प्रवेश करना चाहते हो } आज से कुछ ही समय में स्वायम्भुव मनु अपनी पत्नी शतरूपा और कन्या देवहूति के साथ तुम्हारे आश्रम पर आयेगे | देवहूति अत्यंत सुशिल,गुणवती और पवित्र है | वही तुम्हारी पत्नी होने के योग्य है उस से तुम्हें नौ कन्याएं और मेरे ही अंश से एक पुत्र प्राप्त होगा ,जो सांख्य शास्त्र का प्रवर्तक होगा और अपनी माता को तत्व ज्ञान का उपदेश देगा |” इतना कह कर भगवान अन्तर्धान हो गए |कर्दम मुनि भगवान की आज्ञा की प्रतीक्षा करते हुए उसी बिन्दुसर तीर्थ पर निवास करने लगे |
स्वायम्भुव मनु और देवहूति का आगमन –
उधर सत्ययुग में स्वायम्भुव मनु महाराज अपनी पत्नी शतरूपा के साथ पृथ्वी का शासन करते थे | उन की दो पुत्रियाँ थीं ,आकूति और देवहूति और दो पुत्र -प्रियव्रत और उतानपाद | जब देवहूति बिबाह के योग्य हुई तो महाराज मनु को उस के लिए योग्य वर की चिंता हुई |उन्होंने सुना कि सरस्वती तट पर कर्दम ऋषि तपस्या कर रहे हैं ,जो ब्रह्मा जी के पुत्र और अत्यंत तेजस्वी हैं |अपनी कन्या के लिए उन से उतम वर कोई नहीं हो सकता |
अपनी पत्नी और पुत्री देवहूति को लेकर महाराज मनु रथ में बैठ कर कर्दम ऋषि के आश्रम पर पहुंचे | कर्दम जी का आश्रम अत्यंत रमणीक था |चारों और वेद ध्वनी गूँज रही थी ,हवन की सुगंध फैली हुई थी| महाराज मनु ने विनम्रता से कर्दम जी को प्रणाम किया और कहा,”-मुनिवर ,मैं अपनी पुत्री देवहूति को आप के चरणों में अर्पित करने आया हूँ | यह ब्रह्मवादिनी है ,सुशील और आप की सेवा के योग्य है |मैंने सुना है कि आप गृहस्थ धर्म में प्रवेश करना चाहते हैं अत: आप इसे पत्नी रूप में स्वीकार करें |
कर्दम का प्रतिज्ञा वचन –
कर्दम जी ने कहा ,”हे राजन, आप की पुत्री के गुणों की प्रशंसा मैंने भी सुनी है | मैं इसे पत्नी रूप में स्वीकार करता हूँ ,पर मेरी भी एक प्रतिज्ञा है | जब तक इसे पुत्र की प्राप्ति नहीं होती तब तक मैं गृहस्थ में रहूँगा ,पुत्र जन्म के बाद मैं सन्यास ले लूँगा |क्यों कि मेरा लक्ष्य अंत में मोक्ष ही है |
महाराज मनु ने यह शर्त सहर्ष स्वीकार कर ली | देवहूति ने भी मन ही मन कर्दम जी को पति रूप में वरण कर लिया था ,और उन की सेवा में लग गई |रानी शतरूपा ने अपनी पुत्री को अनेक वस्त्र,आभुषण और दास दासियाँ दहेज में दीं | विवाह के पश्चात मनु और शतरूपा अपनी राजधानी लौट गए |
यहाँ से एक आदर्श गृहस्थ जीवन की कथा आरम्भ होती है ,जहाँ एक राज कन्या वन में रह कर अपने तेजस्वी पति क निष्काम सेवा करती है ,जो आगे चल कर भगवान कपिल के अवतार का कारण बनती है |
इस अध्याय का आध्यात्मिक संदेश –
इस इक्कीसवें अध्याय में तीन महान शिक्षाएं हैं |पहली,यदि गृहस्थ धर्म भी भगवान की आज्ञा और भक्ति से किया जाए तो वह बंधन नहीं ,मोक्ष का साधन बन जाता है | कर्दम जी ने भोग के लिए नहीं ,ब्रह्मा जी क आज्ञा से गृहस्थ में प्रवेश किया |
दूसरी – पति-पत्नी का सम्बन्ध केवल शारीरिक नहीं,बल्कि आध्यात्मिक उन्नति का साधन होना चाहिए | देवहूति ने राजमहल का सुख त्याग कर तपस्वी पति की सेवा को ही अपना धर्म माना |
तीसरी- भगवान अपने भक्त की प्रत्येक कामना को पवित्र करके पूर्ण करते हैं | कर्दम जी ने पत्नी मांगी तो भगवान ने उन्हें ऐसी पत्नी दी जो स्वयं मोक्ष की अधिकारी बनी,और पुत्र के रूप में स्वयं भगवान ही उन के घर में अवतरित होने का वरदान दिया |
इसी दिव्य वरदान के साथ तृतीय स्कन्ध के इक्कीसवें अध्याय की कथा विश्राम लेती है ,और अगले अध्याय में कर्दम देवहूति के दिव्य दाम्पत्य और भगवान कपिल के अवतार की कथा का विस्तार आता है |
इति श्रीमद्भागवते महापुराण पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे एकविशोSध्याय: || २१ ||
लेखक-मदन लाल शर्मा
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