सनातन की परिभाषा -सनातन क्या है ?
अर्थ- जो शाश्वत है ,जिस का ना आदि है न अंत | जो सदियों से है और रहेगा |
सनातन धर्म किसी एक व्यक्ति ,ग्रन्थ या समय में शुरू हुआ मत नहीं है,बल्कि जीवन जीने का वह प्राकृतिक नियम है जो सृष्टि के साथ ही उत्पन्न हुआ ,इसे ही हिन्दू धर्म कहा जाता है ,पर इस का मूल नाम सनातन धर्म ही है |
सनातन की नीव चार स्तम्भों पर है :-
१. सत्य – सत्य ही ईश्वर है | सत्यनारायण यही है |
2. अहिंसा -मन बाणी और कर्म से किसी को कष्ट न पहुंचाना |
3.दया और करुणा -सभी जीवों में एक ही आत्मा को देखना |
४. तप और संयम – अपनी इन्द्रियों औए अपनी इच्छाओं पर नियन्त्रण |
इन के अतिरिक्त –
५. त्याग- किसी चीज ,इच्छा,सुख या अधिकार को छोड़ना या त्याग करना| उच्च लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपने स्वार्थ को छोड़ना |
६. संतोष – मन की भावना की पूर्णता है,संतोष एक नैतिक अवस्था है |
7. समदर्शी – जो सभी को समान दृष्टि से देखता है किसी से भेदभाव नहीं रखता ,दूसरों के सुख दुःख को अपना समझे,सब के साथ एक सा व्यबहार करे | निष्पक्षता और संतुलन को दर्शाता है
9. तितिक्षा -सहनशीलता ,धीरज,- सुख दुःख,सर्दी गर्मी,लाभ हानि और मान अम्मान जैसी सभी विपरीतताओं को बिना विलाप किये धैर्य पूर्वक सहन करने की क्षमता |
८. आत्म चिन्तन – अपने विचारों ,व्यबहारों ,विश्वासों पर गहराई से विचार करके मूल्यांकन करने की प्रक्रिया है |
10. उचित -अनुचित की समझ -क्या ठीक है क्या गलत ,जो काम सभी की भलाई के लिए हो वह उचित है और जो काम उस के विरुद्ध हो वह अनुचित है|
११.भोगों से निवृति -तात्पर्य संसारिक सुखो और पदार्थों के प्रति अत्याधिक आसक्ति को छोड़ना |
12. स्वाध्याय -अपने व्यक्तित्व और विचारों का अध्ययन करना |
१३, मन का संयम – अपने मन और इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखना ही संयम होता है |
१४. शौच – इस का सम्बन्ध पवित्रता और निर्मलता से है |
१५. अभिमान और घमंड -अभिमानी लोगों के कुकृत्यों का फल उल्टा ही मिलता है |
१६.मौन- ध्यान की एकाग्रता को बढाता है और सचेतना को बढाता है |
१७. अन्न का यथायोग्य विभाजन -सब प्रकार के धन ईश्वर के हैं उन का सब के लिए समान वितरण होना चाहिए |
१८. मनुष्यों में आत्मा तथा इष्टदेव का भाव -सभी प्राणीयों में आत्मा परमात्मा का ही अंश है | उन से मित्रवत व्यबहार करना चाहिए |
१९. क्षमा- कोई अगर गलती करता है या आप को कष्ट देता है तो उसे क्षमा करना |
२०- धृति-धैर्य रखना ,कठिन समय में भी मन को स्थिर रखना |
२१. दम-अपने मन को वश में रखना |
२२. अस्तेय-चोरी न करना ,दुसरे के हक का न लेना |थी – बुद्धि का सही उपयोग करना,विवेक से काम लेना |
२३.अक्रोश -गुस्से को वश में रखना |
२४. दान- परोपकार करना |
25. सब का कल्याण सब में ईश्वर देखना |
विवेकानन्द के अनुसार ” -ईश्वर पृथ्वी के सभी धर्मों में विद्यमान है और अनन्त काल तक रहेगा | “”मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव |” मैं इस जगत में मणियों के अन्दर सूत्र की तरह विद्यमान हूँ-प्रत्येक मणि को एक विशेष धर्म-मत या सम्प्रदाय कहा जा सकता है | पृथक पृथक मणियाँ एक एक धर्म है और प्रभु ही सूत्र रूप में उन सब में बिद्यमान हैं |निस्वार्थ होना ही धर्म की पहचान है |
संसार के जितने भी धर्म हैं ,वे परस्पर विरोधी या प्रतिरोधी नहीं हैं |वे केवल एक ही चिरन्तन शाश्वत धर्म के भिन्न भिन्न भाव मात्र हैं | यही एक सनातन धर्म चिरकाल से समस्त विश्व का आधार रूप रहा है |
मह्रिषी दयानन्द सरस्वती -हिन्दू नहीं आर्य हैं |
सत्य प्रकाश – हिन्दू गाली है |
जब ओरंगजेब ने जजिया लगाया तो ब्राह्मणों ने कहा था कि हम हिन्दू नहीं हैं हम आर्य है |हिमालय और विन्ध्याचल के बीच को आर्यावर्त कहते हैं |
आज जो अपने आप को सनातनी कहते हैं क्या यह सब गुण सनातन के उन में हैं यदि नहीं हैं तो उन को आप क्या कहेंगे ? सनातन के विरुद्ध हमेशा ही आदि काल से दैत्य रहे हैं | जब दैत्यों के अत्याचार बढ़ जाते हैं तो फिर किसी न किसी रूप में पुरुषोतम को आना ही पड़ता है
क्या विचार हैं आप के ?तुलना करके देख लें |
इति –
मदन लाल शर्मा
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