श्रीमद्भागवत स्कंध तृतीय:द्वादशोSध्याय
सृष्टि विस्तार ,कुमारों का वैराग्य और रूद्र की उत्पति –
श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कन्ध के बारहवे अध्याय में सृष्टि के आदि रहस्य का वर्णन है |यह वह समय है जब भगवान के नाभि कमल से उत्पन्न ब्रह्मा जी सृष्टि रचना का संकल्प तो लिया,परन्तु सृष्टि आगे बढ़ नहीं रही थी | विदुर जी के पूछने पर मैत्रेय ऋषि यह कथा सुनाते हैं |
सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा जी ने सब से पहले अज्ञान की पांच वृतियों को उत्पन्न किया -तम,मोह,महामोह,तामिस्त्र और अंध तामिस्त्र | ये अज्ञान के ही रूप हैं | तम अर्थात आत्मा को न जानना ,मोह अर्थात देह को ही आत्मा मान लेना ,महामोह अर्थात भोग की लालसा,तामिस्त्र अर्थात भोग न मिलने पर क्रोध,और अंध तामिस्त्र अर्थात मृत्यु का भय | ब्रह्मा जी ने देखा कि ये तो बड़ी पापमयी सृष्टि है ,इसे देख कर उन्होंने अपने मन को शुद्ध किया और इसे त्याग दिया |
फिर ब्रह्मा जी ने ध्यानस्थ हो कर भगवान का स्मरण किया |उन के मन से चार निर्मल,तेजस्वी बालक उत्पन्न हुए | वे थे सनक,सनन्दन,सनातन और सनत्कुमार |ये चारों कुमार जन्म से ही वैरागी,आत्मज्ञानी और पांच वर्ष के बालक के समान दिखने वाले थे |
ब्रह्मा जी ने प्रसन्न हो कर उन से कहा-” पुत्रो,तुम मेरी सृष्टि को आगे बढाओ,प्रजा प्रसन्न करो|”परन्तु कुमारों का हृदय तो पहले से ही भगवान वासुदेव में लगा हुआ था | वे जन्म से ही ब्रह्मचारी थे | उन्होंने अपने पिता की इस आज्ञा को स्वीकार नहीं किया | वे बोले -” पिता जी ,हम तो भगवान के भजन में ही अपना जीवन लगायेंगे ,हम इस मोहमाया की सृष्टि में नहीं बंधेंगे |” कहते हैं ,सच्चे ज्ञानी वही हैं जो सृष्टि को भोगने की नहीं,बल्कि उस के रचयिता को जानने की इच्छा रखते हैं |कुमारों का वैराग्य देख ब्रह्मा जी को पहले तो दुःख हुआ,फिर क्रोध आया | पुत्रों द्वारा आज्ञा का उल्लंघन किसी भी पिता को क्रोधित कर सकता है |
ब्रह्मा जी ने अपने क्रोध को रोकने का बहुत प्रयत्न किया ,परन्तु वह क्रोध उन की भौंहों के बीच से एक नील-लोहित वर्ण के बालक के रूप में प्रकट हो गया |वह बालक जोर जोर से रोने लगा |ब्रह्मा जी ने कहा-“रोओ मत ” ” माँ रोदी “| इस से उस का नाम “रूद्र”पड़ा | रूद्र ने कहा -“पितामह ,मेरा नाम और रहने का स्थान बताइए|”
ब्रह्मा जी ने कहा-“तुम्हारा नाम रूद्र होगा | तुम्हारे रहने का स्थान हृदय,इन्द्रियां,प्राण,आकाश,वायु,अग्नि,जल,पृथ्वी,सूर्य,चन्द्रमा और तप होंगे |तुम्हारे ग्यारह नाम होंगे-मन्यु,मनु,महिनस ,महत,शिव,ऋतध्वज ,उग्र्रेता ,भव,काल, वामदेव और धृतव्रत और तुम्हारी ग्यारह पत्नियां होंगी -धी,धृति,रसला ,उमा,नियुव,सर्पी,इला, अम्बिका,इरावती,सुधा और दीक्षा ,जिन से तुम्हारे अनेक पुत्र होंगे |”
इस प्रकार रूद्र को आदेश दे कर ब्रह्मा जी ने शान्ति की सांस ली |परन्तु सृष्टि अभी भी नहीं बढ रही थी ,तब ब्रह्मा जी ने अपने मन से दस और पुत्रों को उत्पन्न किया जो प्रजापति कहलाये -मरीचि,अत्री,अंगीरा,पुलस्य,पुलह,क्रतु,भृगु,वशिष्ठ,दक्ष और नारद | यह सब ब्रह्मा जी के मानस पुत्र कहलाये |
इन में से नारद जी भी अपने बड़े भाइयों कुमारों की तरह वैरागी निकले | ब्रह्मा जी ने नारद से भी सृष्टि बढाने को कहा ,तो नारद जी ने भी स्पष्ट मना कर दिया और कहा कि वे तो ब्रह्मचारी रह कर भगवान के लोकों में भ्रमण करेंगे | इस से ब्रह्मा जी को फिर क्रोध आया और उन्होंने नारद को शाप दे दिया कि तुम एक स्थान पर नहीं टिक पाओगे | बदले में नारद जी ने भी ब्रह्मा जी को शाप दिया कि आप की पूजा तीन लोकों में कहीं नहीं होगी |
अब ब्रह्मा जी अत्यंत चिंतित हुए,उन्होंने भगवान का ध्यान किया | तब उन की प्रसन्नता के लिए भगवान की कृपा से उन के शरीर के दो भाग हो गए, दहिने भाग से एक पुरुष प्रकट हुआ-मनु और वाए भाग से एक सुन्दर स्त्री प्रकट हुई -शतरूपा | यही संसार की प्रथम स्त्री और प्रथम पुरुष थे |
मनु को स्वायंभुव मनु कहा जाता है | ब्रह्मा जी ने उन से कहा -” तुम दोनों पति-पत्नी के रूप में रहो इस सृष्टि को बढाओ |तुम धर्म का पालन करना ,तुम्हारे वंश से सारा संसार भरेगा |”
स्वायंभुव मनु और शतरूपा बड़े धर्मात्मा थे | उनसे प्रियव्रत ,उत्तानपाद और तीन कन्याएं-आकूति ,देवहूति और प्रसूति उत्पन्न हुईं | आकूति का विवाह रुचि प्रजापति से ,देवहूति का विवाह कर्दम ऋषि से और प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति से हुआ ,इन्हीं से आगे चल कर सारी सृष्टि का विस्तार हुआ |
इस अध्याय का गहरा संदेश यह है कि सृष्टि केवल वासना और इच्छा से नहीं,बल्कि त्याग और वैराग्य के संतुलन से चलती है |जहाँ कुमार और नारद जैसे वैरागी सृष्टि को ज्ञान और भक्ति का प्रकाश देते हैं ,वहीं मनु और शतरूपा जैसे गृहस्थ सृष्टि को कर्म और धर्म का आधार देते हैं | एक के बिना दूसरा अधूरा है |ब्रह्मा जी का क्रोध भी सिखाता है कि काम बनते बनते जब बाधा आती है तो क्रोध स्वाभाविक है,परन्तु उस क्रोध को भी यदि भगवान के चरणों में लगा दिया जाए तो उस से रूद्र जैसे कल्याणकारी शक्ति का जन्म होता है ,जो अंत में संहार करके भी कल्याण ही करती है |
इति श्रीमद्भागवते महापुराण पारमहंस्यां संहितायां तृतीय -स्कन्धे द्वादशोSध्याय: ||12||
लेखक-मदन लाल शर्मा
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