नचिकेता -मृत्यु के बाद की स्थिति – कथा
भारतीय अध्यात्म के इतिहास में मृत्यु जैसा गूढ़ रहस्य शायद ही कोई दूसरा हो | मृत्यु क्या है ? मरने के बाद क्या होता है ? क्या आत्मा बचती है ? कठोपनिषद का नचिकेता -यम संवाद इन्हीं प्रश्नों का सब से प्राचीन ,तार्किक और मार्मिक उतर है |यह केवल एक बालक की कथा नहीं ,बल्कि मनुष्य की अमरत्व की खोज की कथा है |
कथा का संक्षेप –
वाजश्रवा ऋषि ने विश्वजीत यज्ञ किया और दान में बूढी दूध न देने वाली गायें देना शुरू कीं | यह देख कर उन के पुत्र नचिकेता को लगा कि पिता का दान निष्फल हो रहा है |उस ने पूछा,”पिता जी ,आप मुझे किसे देंगे ?”क्रोध में पिता ने कह दिया-“मैं तुम्हें मृत्यु को देता हूँ |”
सत्य का पालन करने के लिए नचिकेता यम लोक चला गया | यमराज तीन दिन तक बाहर थे |नचिकेता ने बिना अन्न, जल के द्वार पर प्रतीक्षा की “लौटने पर यमराज ने अतिथि का अनादर समझ कर प्रायश्चित के लिए तीन वर मांगने को कहा |
पहला वर -पिता का क्रोध शांत हो और वे मुझे पहचानें |
दूसरा वर- स्वर्ग को ले जाने वाली अग्नि-बिद्या का ज्ञान |
तीसरा वर-वही सब से कठिन प्रश्न -जिसे आज तक मनुष्य पूछता आ रहा है -,”मृत्यु के बाद क्या होता है ?कुछ लोग कहते हैं आत्मा रहती है ,कुछ कहते हैं नहीं रहती |आप ही बताइए ,सत्य क्या है ?”
यमराज ने इस प्रश्न को टालना चाहा | उन्होंने कहा-“नचिकेता ,धन,सम्पति,पुत्र,पशु,सौ वर्षों की आयु,स्वर्ग की अप्सराएं ,बड़े बड़े राज्य मांग लो ,पर मृत्यु का रहस्य मत पूछो |यह देवताओं के लिए भी दुर्विज्ञेय है “| पर नचिकेता अडिग रहा |उस ने कहा,” यह सब नश्वर है,जो वस्तु कल रहेगी ही नहीं,उस से मुझे क्या मुझे तो उसी अविनाशी सत्य का ज्ञान चाहिए |” बालक की द्दढता से प्रसन्न हो कर यमराज ने मृत्यु के बाद की स्थिति का रहस्य खोला |
यमराज द्वारा वर्णित मृत्यु के बाद की स्थिति
यमराज ने कहा ,हे नचिकेता, सुनो-
१. आत्मा न मरती है-न जन्मती है | मूर्ख समझते हैं कि शरीर ही सब कुछ है |शरीर मरता है ,आत्मा नहीं |
” न जायते म्रियते वा विपश्चित: “-यह आत्मा न कभी जन्म लेती है न मरती है |यह अजन्मा,नित्य,शाश्वत और पुरातन है |शरीर के नष्ट होने पर भी इस का नाश नहीं होता | जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र छोड़ कर नए वस्त्र धारण करता है ,वैसे ही आत्मा एक शरीर छोड़ कर दूसरे शरीर में चली जाती है |मृत्यु केवल वस्त्र परिवर्तन है,अंत नहीं |
2. मृत्यु के दो मार्ग हैं : यमराज ने दो मार्ग बताये -श्रेय मार्ग और प्रेय मार्ग |
प्रेय मार्ग वह है जिस पर अधिकाँश लोग चलते हैं – भोग,सुख,धन,इन्द्रियों की तृप्ति |जो इस मार्ग पर चलता है ,वह मृत्यु के बाद भी वासनाओं के बंधन में बंधा रहता है और बार बार जन्म-मरण के चक्र में पड़ता है |
श्रेय मार्ग वह है जो कल्याण का मार्ग है -आत्म ज्ञान ,संयम,सत्य ,जो विवेकी मनुष्य श्रेय चुनता है ,वह अमरत्व को प्राप्त करता है |वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है |
3. शरीर रथ है ,आत्मा रथी है :
यमराज ने एक सुन्दर रूपक दिया | हमारा शरीर एक रथ है ,बुद्धि सारथी ,मन लगाम है,इन्द्रियां घोड़े और आत्मा इस रथ में बैठा हुआ स्वामी है |जिस व्यक्ति की इन्द्रियाँ वश में नहीं,उस की मन रुपी लगाम ढीली है ,वह रथी कभी लक्ष्य तक नहीं पहुंचता और मृत्यु के बाद भटकता है |पर जिस का मन वश में है,इन्द्रियाँ संयमित हैं ,वही परम पद को प्राप्त करता है ,जहाँ से लौटना नहीं पड़ता |
४. मृत्यु के बाद की गति कर्म और वासना से तय होती है :
मृत्यु के बाद आत्मा की कोई नई स्वतंन्त्र गति नहीं होती ,वह उसी दिशा में जाती है ,जो उस ने जीवन में बनाई है | जैसे मृत्यु के समय मनुष्य की जैसी मति होती है ,वैसी ही उस की गति होती है -“अन्ते मति:सा गति:” | जिस ने जीवन भर केवल शरीर को ही “मैं ” समझा ,वह शरीर छूटने पर अन्धकार में पड़ता है |जिस ने आत्मा को जाना ,वह प्रकाश में जाता है |यमराज कहते हैं,”हृदय की सभी गांठें ,सभी वासनाएं ,सभी कामनाएं जब तक नहीं कट जातीं ,तब तक मुक्ति नहीं,जो यहाँ,इसी जीवन में आत्मा को जान लेता है ,वह अमर हो जाता है |
५. परम सत्य -ब्रह्म की प्राप्ति :
अंत में यमराज ने कहा -” मृत्यु के बाद आत्मा का अंतिम लक्ष्य परम ब्रह्म में लीन होना है |वह ब्रह्म न शब्द है,न रूप, न रस,न गंध | वह अंगूठे के बराबर हृदय -गुहा में स्थित ज्योति स्वरूप है | उसे तर्क से नहीं,ध्यान और योग से जाना जाता है |जब पाँचों इन्द्रियाँ मन के साथ स्थिर हो जातीं हैं और बुद्धि भी निश्चल हो जाती है ,तब आत्मा का साक्षात्कार होता है |वही अवस्था मृत्यु पर विजय है |
आज का संदेश –
नचिकेता का प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है || आज का मनुष्य मृत्यु को भूल कर केवल भोग में लगा है |कठोपनिषद हमें सीखाता है कि सच्ची जिज्ञासा में उम्र बाधा नहीं | एक बालक ने वह प्रश्न पूछा जो बड़े बड़े ऋषि भी पूछने का साहस नहीं करते और यमराज ने सिखाया कि सत्य उसी को मिलता है जो प्रेय को छोड़ कर श्रेय को चुनता है ,जो क्षणिक सुख के बदले शाश्वत सत्य की मांग करता है |
मृत्यु के बाद की स्थिति कुछ और नहीं,हमारे जीवन जीने के ढंग का ही विस्तार है ,यदि जीवन ज्ञान ,वैराग्य और संयम है तो मृत्यु महोत्सव बन जाती है ,यदि अज्ञान है तो मृत्यु भय बन जाती है |
इति
मदन लाल शर्मा
वेबसाइट -thegodweknow.com
