जनक का आत्म चिन्तन

मिथिला के सिंहासन पर बैठा हुआ मैं,जनक | लोग मुझे राजा कहते हैं ,विदेह कहते हैं ,ज्ञानी कहते हैं | पर मैं कौन हूँ? यही प्रश्न मेरे जीवन का केंद्र बन गया है |

१.सिंहासन पर बैठा सन्यासी

मेरे चारों और वैभव है ,स्वर्ण जडित राजमहल ,रत्नों से भरा राजकोष सेना,मंत्री ,प्रजा का जय जयकार | मेरे आदेश पर हजारों लोग दौड़ पड़ते हैं | मेरे एक संकेत पर युद्ध और शान्ति का निर्णय होता है | पर रात्री में जब सब शांत होता है , जब दीपक मंद पद जाते हैं और महल की दीवारें सो जाती हैं | तब मैं अपने आप से पूछता हूँ -क्या यह सब मेरा है ? यह मुकुट जो मेरे सिर पर है ,क्या वह मैं हूँ ? यह सिंहासन जिस पर मैं बैठा हूँ ,क्या यह मेरी पहचान है ? यदि कल यह मुकुट उतर जाए ,यदि यह राज्य छिन जाए ,तो क्या जनक समाप्त हो जाएगा ?

उपनिषदों ने कहा है ‘नेति नेति ‘-यह नहीं यह नहीं |मैं यह शरीर नहीं हूँ जो प्रतिदिन जीर्ण हो रहा है | मैं यह मन भी नहीं हूँ ,जो कभी हर्ष से उछलता है ,कभी शोक में डूब जाता है | मैं यह बुद्धि भी नहीं जो तर्क वितर्क में उलझी रहती हैं |

तो फिर मैं कौन हूँ?यही आत्म चिन्तन है |

2. विदेह होने का अर्थ -लोग मुझे विदेह कहते हैं ,देह से परे |उन्हें लगता है यह कोई सिद्धि है ,कोई चमत्कार है |पर विदेह होना कोई चमत्कार नहीं ,एक बोध अर्थात ज्ञान है | मैंने जाना कि देह में रह कर भी देह का न होना सम्भव है | जैसे कमल जल में रह कर भी जल से अलिप्त रहता है ,वैसे ही ज्ञानी संसार में रह कर भी संसार से लिप्त नहीं होता |मैं राजकाज करता हूँ न्याय करता हूँ ,युद्ध की नीति बनाता हूँ ,पुत्री सीता से प्रेम करता हूँ ,-सब करता हूँ ,पर कर्ता भाव से नहीं | मेरे भीतर एक साक्षी बैठा है जो देख रहा है कि जनक नाम का एक पात्र अपनी भूमिका निभा रहा है | वह साक्षी न सुखी होता है न दुखी वह केवल देखता है |

यह विदेह्ता है | शरीर को अपना वस्त्र समझना ,वस्त्र मैला हो तो हम दुखी नहीं होते ,उसे साफ़ कर लेते हैं | शरीर रोगी हो तो उस का उपचार करते हैं ,उस के साथ तादात्म्य नहीं करते | जब ऋषि याज्ञवल्क्य ने मुझे ब्रह्म ज्ञान दिया .तो उन्होंने कहा था -“जनक तुम राजा हो तुम्हें त्याग करने की आवश्यकता नहीं ,त्याग बाहर का नहीं ,भीतर का होता है “|मैंने उसी क्षण समझ लिया सन्यास वन में जाने से नहीं होता ,मन में होता है |

3. दो सताओं की क्षुब्धता अर्थात संघर्ष

मेरे भीतर निरन्तर दो सताओं का संघर्ष चलता रहता है |

एक सता है -जनक मिथिला का राजा ,उसे चिंता है कि प्रजा सुखी रहे ,राजकोष भरा रहे ,पड़ोसी राजा मित्र बने रहें ,वह योजना बनाता है , चिंतित होता है क्रोधित भी होता है |

दूसरी सता -वो जो केवल है ,जिस का कोई नाम नहीं ,कोई रूप नहीं |जो अजन्मा है ,अविनाशी है | जो न राजा है न प्रजा | जो केवल प्रकाश है ,केवल बोध है |

पहले सोचता था कि इन दोनों में से एक को चुनना होगा या तो राजा बन कर रहूँ या सब छोड़ कर आत्मा में लीन हो जाऊं || पर अब समझता हूँ ,चुनाव की आवश्यकता ही नहीं है ,जैसे आकाश में बादल आते हैं और चले जाते हैं ,पर आकाश वैसा ही रहता है ,वैसे ही जनक के सारे कर्म उस चेतना के आकाश में आते जाते बादल हैं | मैं कर्म करता हूँ ,पर कर्म मुझे बांधता नहीं क्यों कि मैं जानता हूँ ,कर्म शरीर कर रहा है ,मन कर रहा है ,बुद्धि कर रही है |आत्मा कुछ नहीं करती ,वह केवल है |

श्रीमद्भागवद गीता में जो योगेश्वर कृष्ण अर्जुन को समझायेंगे ,वही बोध मुझे हो रहा है -अनासक्त कर्म ,फल की इच्छा के बिना कर्म |

४.माया और सत्य –

यह संसार क्या है ? कभी यह सत्य लगता है ,इतना ठोस इतना प्रबल ,मेरी पुत्री सीता की मुस्कान,प्रजा की पीड़ा ,युद्ध का भय-अब सत्य लगता है और कभी लगता है यह एक स्वप्न है जैसे रात्री में स्वप्न में हम महल देखते हैं ,रोते हैं ,हंसते हैं और जागने पर सब मिथ्या हो जाता है ,वैसे ही क्या यह जाग्रत अवस्था भी एक लम्बा स्वप्न तो नहीं ?

मैंने गहराई से देखा -जो बदलता है ,वह सत्य नहीं हो सकता | यह शरीर बचपन में कुछ और था ,युवा अवस्था में कुछ और वृद्धा अवस्था में कुछ और | यह राज्य भी कभी छोटा था ,कभी बड़ा होगा | यह मान अपमान ,जय पराजय -सब बदलते है |तो अपरिवर्तनीय क्या है ? वही जो इन सब परिवर्तनों को देख रहा है ,वही साक्षी,वही आत्मा वही ब्रह्म |

माया का अर्थ झूठ नहीं है | माया का अर्थ है जो है नहीं वैसा दिखना | रस्सी में सांप दिखना ,सांप मिथ्या है ,पर रस्सी सत्य है |वैसे ही संसार मिथ्या नहीं ,पर संसार को स्वतंत्र और स्थाई समझना माया है | संसार ब्रह्म पर ही टिका है ,जैसे तरंगें समुद्र पर |

५. ज्ञान की पीड़ा औउर आनन्द-

लोड समझते हैं ज्ञानी सदा आंनद में रहता है | पर ज्ञान की एक पीड़ा भी है | जब तुम जान लेते हो कि सब एक है ,तो परायापन मिट जाता है | तब किसी दुखी को देख कर यह नहीं लगता कि दूसरा दुखी है ,लगता है मैं ही दुखी हूँ | एक एकत्व का बोध करूणा को अनंत कर देता है | इसलिए मैं राजा बना रहा | यदि मैं सब छोड़ कर हिमालय चला जाता ,तो मेरा मोक्ष तो हो जाता ,पर मेरी प्रजा का क्या होता ? ज्ञान का अर्थ पलायन नहीं ,उतरदायित्व है ,जो जानता है ,उस का दायित्व अधिक है |

ओर ज्ञान का आन्नद ? यह शब्दों में नहीं कहा जा सकता | वह ऐसा है जैसे कोई गूंगा गुड खाए और उस का स्वाद न बता पाए | भीतर एक अखंड शान्ति है ,एक ऐसी शान्ति जो किसी कारण पर निर्भर नहीं ,बाहर चाहे युद्ध हो या उत्सव ,भीतर वह दीया जलता ही रहता है ,बिना तेल के ,बिना वाती के | मैंने जाना ” मैं ” शरीर नहीं ,मन नहीं ,मैं राजा नहीं ,मैं पिता भी नहीं |मैं वह शुद्ध चेतना हूँ,जिस में सारा जगत क्रीडा कर रहा है |जैसे सूर्य के प्रकाश में सारा संसार चमकता है ,पर सूर्य किसी में लिप्त नहीं होता |

६. अंतिम बोध अर्थात ज्ञान –

आज इस चिन्तन के अंत में ,मैं क्या कहूँ ? मैं कहूँगा -स्वयं को खोजो |बाहर नहीं , ,भीतर |मन्दिर में नहीं ,मस्जिद में नहीं ,वेदों में भी नहीं | अपने भीतर उस साक्षी को खोजो जो सदा से तुम्हें देख रहा है |

राज्य छोड़ने की आवश्यकता नहीं ,संसार छोड़ने की आवश्यकता नहीं ,केवल दृष्टि से द्रष्टा की दृष्टि पर आ जाओ | मैं जनक मिथिला का राजा ,यह घोषणा करता हूँ “-मैंने पा लिया है | न कुछ पा कर ,सब कुछ पा लिया है ,न कहीं जा कर , अपने आप में आ गया हूँ | मैं विदेह हूँ ,क्यों कि मैं जान गया हूँ कि बंधन कभी था ही नहीं ,केवल भ्रम था ,जो ज्ञान के प्रकाश में टूट गया |

यहाँ आत्म चिन्तन समाप्त नहीं होता | यह तो प्रतिपल चलता ही रहता है | हर श्वास के साथ ,हर कर्म के साथ ,वही प्रश्न -” मैं कौन हूँ ?” और हर बार वही उतर “अहं ब्रह्मास्मि ,मैं ब्रह्म हूँ “|

इति- जनक का आत्म चिन्तन -अगले शनिवार एक और ऋषि का आत्म चिन्तन / आत्म ज्ञान पढ़ते रहें

लेखक-मदन लाल शर्मा

वेबसाइट -http://thegodweknow.com

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