श्रीमद्भागवत तृतीय स्कन्ध:अष्टमोSध्याय:

ब्रह्मा जी की उत्पति –

बहुत काल पहले की बात है |जब यह सम्पूर्ण सृष्टि महाप्रलय के जल में डूबी हुई थी ,चारों और केवल अथाह अनन्त जल का साम्राज्य था ,न धरती थी ,न आकाश .,न सूर्य चन्द्र ,न दिन रात | उस घौर अन्धकार और जलप्लावन में भगवान श्रीहरि विष्णु योगनिन्द्रा में लीन थे |

शेषशय्या पर श्रीहरि –

क्षीरसागर के अनन्त में जल पर शेषनाग की सहस्त्र फनों वाली शय्या विछी थी |उस दिव्य शय्या पर नीलकमल के समान श्याम वर्ण वाले चतुर्भुज भगवान् विष्णु शांत भाव से शयन कर रहे थे | उन के नेत्र कमल के समान कोमल थे ,पर अभी वे बंद थे |उन की योगमाया ने सारे जगत को अपने में समेट रखा था | हजारों वर्षों तक यही स्थिति बनी रही |

नाभी कमल का प्राकट्य –

जब सृष्टि रचने का समय आया तब भगवान विष्णु की नाभी से से एक अद्भुत विशाल और तेजोमय कमल प्रकट हुआ | वह कमल सहस्त्र दल का था ,स्वर्ण के समान देदीप्यमान और योजनों तक फैला था | उस के प्रकाश से प्रलय का अन्धकार कुछ क्षण के लिए दूर हो गया | इस कमल की नाल बहुत लम्बी थी और वह सीधे श्रीहरि की नाभी से जुडी थी |

कमल पर ब्रह्मा जी का जन्म –

उसी दिव्य कमल के उपर भगवान की इच्छा से चतुर्मुख ब्रह्मा जी प्रकट हुए | उन के चार मुख चारों दिशाओं को प्रकाशित कर रहे थे |शरीर तपाये हुए स्वर्ण के समान कान्तिमान था |उन्होंने जन्म लेते ही अपनी आँखें खोली | चारों और देखा तो केवल जल ही जल था |और कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं हो रहा था |

ब्रह्मा जी को बड़ा आश्चर्य हुआ | वे सोचने लगे,”मैं कौन हूँ ? कहाँ से आया हूँ ? यह कमल किस के आधार पर स्थित है ?इस जल के अतिरिक्त और कुछ क्यों नहीं दिखता ? ” उन्हों ने अपने चारों मुखों से चारों और देखा ,परन्तु उन्हें अपने अतिरिक्त कोई दूसरा प्राणी नहीं दिखा | उन्हें अपने जन्म का रहस्य समझ में नहीं आ रहा था |

आधार की खोज –

ब्रह्मा जी ने सोचा कि जिस कमल पर मैं बैठा हूँ ,अवश्य ही उस का कोई आधार होगा |यह जानने के लिए वे कमल की नाल के सहारे नीचे उतरने लगे | सौ वर्षों तक लगातार नीचे जाते रहे ,परन्तु उस नाल का अंत नहीं मिला | जल के सिवा कुछ नहीं था |थक हार कर वे फिर उपर कमल पर लौट आये | फिर उन्होंने सोचा कि शायद उपर कोई हो | वे आकाश की और सौ वर्षीं तक उड़ते रहे ,परन्तु कहीं कोई सीमा नहीं मिली | अंत में निराश होकर वे पुन: कमल पर आ कर बैठ गए और विचार करने लगे |

तपस्या और आकाश् बाणी –

ब्रह्मा जी को समझ आ गया कि बिना तप के ज्ञान नहीं होता | वे कमल पर ही पद्मासन लगा कर बैठ गए और सौ दिव्य वर्षों तक कठोर तपस्या की | उन की तपस्या से प्रसन्न हो कर भगवान विष्णु ने उन्हें दर्शन देने का निश्चय किया “

तभी आकाश बाणी हुई,” हे ब्रह्मा ,तप करो ,तप करो |” यह तप शब्द दो बार सुनाई दिया | ब्रह्मा जी ने उसीको भगवान का आदेश मान कर फिर से तप आरम्भ कर दिया | उन की इन्द्रियाँ ,मन और प्राण सब एकाग्र हो गए |

भगवान विष्णु के दर्शन –

लम्बी तपस्या के बाद ब्रह्मा जी को अपने चतुर्भुज रूप में दर्शन दिए | उन के शरीर पर पीताम्बर शोभायमान था,वक्ष पर श्री वत्स का चिन्ह और कौस्तुभ मणि जगमगा रही थी |गले में वन माला ,हाथों में शंख ,चक्र,गदा और पद्म थे | उन के मुख पर मधुर मुसकान थी |

भगवान को देख कर ब्रह्मा जी का हृदय आनन्द से भर गया | उन्होंने हाथ जोड़ कर स्तुति की ,तब श्रीहरि बोले,” हे वत्स ,मैं तुम्हारी तपस्या से बहुत प्रसन्न हूँ | तुम्हें ही मैंने सृष्टि रचने के लिए अपनी नाभी कमल से उत्पन्न किया है | तुम रजो गुण से युक्त हो | अब तुम मेरी शक्ति से सम्पन्न हो कर इस जल में डूबी हुई पृथ्वी को निकालो और नाना प्रकार की सृष्टि की रचना करो”|

सृष्टि का आदेश -भगवान ने ब्रह्मा जी को सम्पूर्ण सृष्टि का ज्ञान ,वेद और रचना की शक्ति प्रदान की | उन्होंने कहा,” जब तक सृष्टि का कार्य करते रहोगे,तब तक मेरी कृपा तुम पर बनी रहेगी | अहंकार मत करना ,जो कुछ करोगे,मेरी प्रेरणा से ही करोगे “|

यह कह कर भगवान अंतर्ध्यान हो गए | ब्रह्मा जी को अब अपने जन्म का रहस्य ,अपना कर्तव्य और भगवान की महिमा समझ आ गई | उन्होंने भगवान को प्रणाम किया और सृष्टि रचना के कार्य में लग गए |

शिक्षा –

इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सृष्टि का आदि कारण भगवान विष्णु ही हैं |ब्रह्मा जी भी उन्हीं से शक्ति पा कर सृष्टि रचते हैं |बिना तप,ज्ञान और भगवान की कृपा के कोई भी बड़ा कार्य संभव नहीं है | अहंकार से नहीं ,विनम्रता और तप से ही परम सत्य की प्राप्ति होती है |

यही श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कन्ध के अष्टम अध्याय में वर्णित ब्रह्मा की उत्पति की पावन कथा है |

लेखक-मदन लाल शर्मा

वेबसाइट-thegodweknow.com ऐसी ही भागवत की पोस्टों को देखते रहें |

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