श्रीमद्भागवत स्कन्ध तृतीय:सप्तमोSध्याय
विदुर जी के प्रश्न –
तृतीय अध्याय के सप्तम अध्याय में हस्तिनापुर छोड़ कर तीर्थ यात्रा करते हुए विदुर जी मुनिवर मैत्रेय जी से मिलते हैं | भगवत लीला कथा सुन कर विदुर जी के हृदय में जो जिज्ञासाए जागी वही इस अध्याय का मूल है | विदुर जी धर्म, राजनिति और अध्यात्म के मर्मज्ञ थे ,इसलिए उन के प्रश्न केवल शंका नहीं ,सम्पूर्ण जगत के कल्याण के लिए उठाए गये तत्व जिज्ञासा है |
१. पहला प्रश्न : निर्गुण भगवान का माया से सम्बन्ध कैसे ?
विदुर जी का प्रश्न -ब्रह्मन ,भगवान तो शुद्ध बोध स्वरूप निर्विकार और निर्गुण है | उन के साथ लीलासे भी गुण और क्रिया का सम्बन्ध कैसे हो सकता है ? बालक तो खेल की इच्छा से खेलते हैं,पर भगवान तो नित्य तृप्त ,पूर्ण काम और असंग हैं तो क्रीडा के लिए क्यों संकल्प करें ?
मैत्रेय जी का उतर :भगवान की लीला अचिन्त्य है जैसे सूर्य का प्रतिबिम्ब जल में पड़ने से जल हिलता प्रतीत होता है ,पर सूर्य अचल रहता है ,वैसे ही निर्गुण भगवान माया के अधिष्ठान बना कर सृष्टि पालन और संहार की लीला करते हैं | उन पर माया का आवरण नहीं चढ़ता | जिन का ज्ञान देश,काल,या अवस्था से लुप्त नहीं होता ,उन का माया से वास्तविक संयोग सम्भव ही नहीं | यह केवल जीवों को मोक्ष मार्ग दिखाने के लिए उन की कृपा लीला है |
2. दुसरा प्रश्न -सर्व साक्षी भगवान को क्लेश कैसे ?
विदुर जी का प्रश्न – ये भगवान ही समस्त क्षेत्रों में साक्षी रूप में स्थित है फिर उन्हें दुर्भाग्य या कमजनित क्लेश की प्राप्ति कैसे हो सकती है ? इस अज्ञान संकट से मेरा मन खिन्न है, आप मेरा मोह दूर कीजिये |
मैत्रेय जी का उतर -भगवान को वास्तव में कोई क्लेश नहीं होता ,जैसे नट विभिन्न वेश धारण करके दुःख सुख का अभिनय करता है ,पर स्वयं उस से अछूता रहता है ,वैसे ही भगवान भक्तों पर अनुग्रह करने ,धर्म की स्थापना और अधर्म का नाश के लिए अवतार लीला करते हैं | जीव अविद्या से अपने को कर्ता-भोक्ता मान कर क्लेश पाता है ,ईश्वर नहीं | अत: भगवान के जन्म कर्म दिव्य हैं,उन्हें तत्व से जानने वाला फिर जन्म नहीं लेता |
3.तीसरा प्रश्न : सृष्टि -क्रमका विस्तृत ज्ञान
विदुर का प्रश्न -विदुर जी ने मैत्रेय जी से कहा “आप ने कहा कि सृष्टि के प्रारम्भ में भगवान ने महतत्व आदि को रचकर उन के अंगों से विराट पुरुष को उत्पन्न किया और स्वयं उस में प्रविष्ट हुए |उस विराट के हजारों पैर ,हजारों बाहें हैं ,उन्हीं से इन्द्रिय,प्राण ,वर्ण आदि उत्पन्न हुए | अब आप उन की ब्रम्हारि विभूतियों का वर्णन सुनाइए – जिन के पुत्र ,पौत्र,नाती और कुटूम्भियों के सहित तरह तरह की प्रजा उत्पन्न हुई |”
मैत्रेय जी का उतर- मैत्रेय जी ने विराट पुरुष के अंगों से वर्ण व्यवस्था ,ब्रह्मा जी द्वारा मरीचि आदि प्रजापतियों की सृष्टि ,स्वायम्भुव मनु-शतरूपा से मानव सृष्टि का आरम्भ ,सर्ग,अनुसर्ग , मन्वन्तर ,भूलोक आदि चौदह लोकों का विस्तार ,तिर्यक ,मनुष्य,देव,सरीसृप ,पक्षी तथा जरायुज ,अण्डज,स्वेदज ,उद्भिज- इन चार प्रकार के जीवों की उत्पति का क्रम बताया |
४.चौथा प्रश्न -भगवान के अवतारों की लीलाएं |
विदुर जी का प्रश्न -” श्री हरि ने सृष्टि स्थिति और संहार के लिए अपने गुणावतार ,ब्रह्मा ,विष्णु और महादेव रूप से जो कल्याणकारी लीलाएं की उन का भी वर्णन कीजिये |”
मैत्रेय जी का उतर – सत्व गुण से विष्णु पालन करते हैं ,रजोगुण से ब्रह्मा सृष्टि करते हैं ,तमोगुण से रूद्र संहार करते हैं | यह तीनो वास्तव में एक ही परमेश्वर की शक्तियाँ हैं | इस के बाद मैत्रेय जी ने वाराह,कपिल,नरनारायण आदि अवतारों की कथा का सूत्रपात किया |
पांचवां प्रशन -धर्म वर्णाश्रम,ज्ञान योग |
विदुर जी का प्रशन – विदुर जी ने वेश,आचारण और स्वभाव के अनुसार वर्णाश्रम का विभाग ,ऋषियों के जन्म, कर्म ,वेदों का विभाग ,यज्ञ विस्तार ,योग,सांख्य ,नारद पांचरात्र तन्त्र ,पाखंड मार्गों में विषमता ,वर्ण संकर ,जीव की गतियाँ ,धर्म अर्थ ,काम ,मोक्ष के अविरोधी साधन ,वाणिज्य ,दंडनिति ,श्राद्ध विधि,पित्रि सृष्टि तथा कालचक्र में ग्रह नक्षत्रों की स्थिति – इन सब को अलग अलग सुनाने की प्रार्थना की |
मैत्रेय जी का उतर – मैत्रेय जी मुस्कुरा कर बोले -” आप तत्व जिज्ञासु हैं, अहंकार हीन हैं” |फिर उन्होंने विदुर को भगवान सकर्षण द्वारा सनकादि ऋषियों को सुनाया गया भागवत तत्व सुनाना आरम्भ किया |उन्होंने वताया कि शुद्र विषय सुख चाहने वालों के दुःख निवृति के लिए यह कथा है |
इस आगे के अध्यायों में मैत्रेय जी क्रमश: ब्रह्मा जी की उत्पति ,वाराह अवतार,कपिलोपदेश आदि द्वारा विदुर जी के समस्त प्रश्नों का समाधान करते हैं |विदुर जी के प्रश्नों की विशेषता यह है कि वे व्यक्तिगत शंका न हो कर लोक हित के लिए है | इसलिए भागवत में कहा गया है -” जिन के हृदय में श्रीमुकुन्द के चरणारविन्द विराजमान हैं,उन भक्त जनों के गुणों को श्रवण करना ही शास्त्राभ्यास का मुख्य फल है “|
सार – तृतीय स्कन्ध का सप्तम अध्याय ” जिज्ञासा-अध्याय है”| इस में विदुर जी ने १)भगवान की माया से सम्बन्ध ,2) ईश्वर के क्लेश का अभाव ,3) विराट से सृष्टि क्रम ,४)गुणावतारों की लीला ,५) वर्णाश्रम ,योग,सांख्य ,काल गणना आदि 25 से अधिक विषयों पर प्रश्न किये |
मैत्रेय जी ने इन प्रश्नों को भगवान की लीला के विस्तार का आधार बनाया | यह संवाद हमें सिखाता है कि सच्ची जिज्ञासा अहंकार शून्य हो तो गुरु स्वयं भगवान का स्मरण करके मुस्कराते हुए तत्व रहस्य खोल देते हैं |
” इति भागवत पुराणे तृतीय स्कन्धे सप्तम अध्याय “
लेखक-मदन लाल शर्मा
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