विविध सृष्टि का वर्णन
ब्रह्मा की रची हुई अनेक प्रकार की सृष्टि का वर्णन की कथा |
श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कन्ध के बीसवें अध्याय सृष्टि विज्ञान का अत्यंत गूढ़ दार्शनिक अध्याय है |इस में मैत्रेय ऋषि विदुर जी को ब्रह्मा जी द्वारा की गई मानसिक सृष्टि का विस्तृत वर्णन करते हैं |यह कथा केवल पौराणिक कथा नहीं,अपितु मानव मनोविज्ञान और प्रकृति के गुणों के मूर्त रूप का अलौकिक चित्रण है |
१.प्रसंग का आरम्भ –
पिछले अध्याय में वराह अवतार द्वारा हिरण्याक्ष का वध और पृथ्वी का उद्धार सुन कर विदुर जी का हृदय भक्ति से भर गया ,उन्होंने मैत्रेय जी से पूछा –
हे,ब्राह्मण,सृष्टि ब्रह्मा जी ने प्रजापतियों -मरीचि आदि और स्वायम्भुव मनु को उत्पन्न करने के बाद प्रजा की वृद्धि के लिए क्या किया ?उन ब्राह्मणों और मनु ने यह संसार अपनी पत्नियों के साथ बनाया या बिना पत्नी के ,अथवा सब ने मिल कर बनाया ?
इस जिज्ञासा पर मैत्रेय जी ने सृष्टि के आदि क्रम का वर्णन आरम्भ किया |
2. महत से लेकर ब्रम्हांड की उत्पति –
मैत्रेय जी कहते हैं ,भगवान विष्णु की इच्छा से जब त्रिगुणमयी प्रकृति में काल और जीवों के उद्द्ष्ट (भाग्य) के द्वारा क्षोभ उत्पन्न हुआ,तब उस से महत-तत्व उत्पन्न हुआ |महत से तीन प्रकार का अहंकार -सात्विक,राजस और तामस उत्पन्न हुआ | इस अहंकार से पांच तन्मात्राएँ,पांच महाभूत आकाश,वायु,अग्नि,जल ,पृथ्वी ,पांच ज्ञानेन्द्रियाँ ,पांच कर्मेन्द्रियाँ और उन के अधिष्ठाता देवता उत्पन्न हुए | ये सभी अलग अलग सृष्टि करने में असमर्थ थे ,तब भगवान की शक्ति से मिल कर इन्होंने एक स्वर्णिम अंड -ब्रम्हांड का रूप धारण किया | वह अंड एक हजार वर्ष तक कारण जल में पड़ा रहा ,फिर ईश्वर ने उस में प्रवेश किया | उन की नाभि कमल से एक हजार सूर्य के समान तेजस्वी कमल प्रकट हुआ ,जिस में सभी लोकों के आश्रय ब्रह्मा जी प्रकट हुए | ब्रह्मा जी ने भगवान की प्रेरणा से पूर्व कल्प के समान ही नाग रूप वाली सृष्टि की रचना करने का संकल्प किया |
3. ब्रह्मा जी की प्रथम सृष्टियां -अविद्या और रात्रि –
सब से पहले ब्रह्मा जी ने अपने तमोगुण से पांच प्रकार की अविद्या उत्पन्न की -तामिस्त्र,अंध तामिस्त्र,मोह,तमस और महातम | ये ही जीव की पांच प्रकार की अज्ञान ग्रन्थियां हैं |अपने इस तामस शरीर को देख कर ब्रह्मा जी को ग्लानी हुई और उन्होंने उसे त्याग दिया |उसी त्यक्त शरीर से रात्रि उत्पन्न हुई,भूख,प्यास से व्याकुल उस शरीर को यक्ष और राक्षसों ने ग्रहण कर लिया | वे भूख से चिलाने लगे-इस की रक्षा मत करो,इसे खा जाओ”| डरे हुए ब्रह्मा जी ने कहा-” अरे तुम मेरी ही सन्तान हो,मेरी रक्षा करो,मुझे मत खाओ|”
४. देवता,असुर और संध्या की उत्पति –
इस के बाद ब्रह्मा जी ने अपने सत्व गुण प्रधान प्रकाशमय शरीर से देवताओं की सृष्टि की | देवता दिन को अपना , मान कर क्रीडा करने लगे | फिर उन्होंने अपने अधो भाग -नितम्ब से अत्यंत कामी असुरों की सृष्टि की |असुर बड़े कामुक थे ,वे स्वयं ब्रह्मा जी पर ही काम वासना से आक्रमण करने लगे | इस निर्लज चेष्टा से ब्रह्मा जी लज्जित ,क्रोधित और भयभीत हो कर वहां से भागे और शरणागत वत्सल भगवान विष्णु की शरण में गए और प्रार्थना की- ” हे ,परमात्मा ,आप की आज्ञा से मैंने इन प्रजाओं को रचा ,पर ये दुष्ट मेरे ही ऊपर टूट पड़े हैं | आप ही दीनों के दुःख हरता हैं|” भगवान ने ब्रह्मा की स्थिति जान कर कहा “इस निन्दित शरीर को त्याग दो |”
ब्रह्मा जी के शरीर त्यागते ही वह शरीर संध्या के रूप में प्रकट हुआ |वह ऐसी सुन्दर नारी के रूप में दिखा जिस के चरणों में पायल बज रही थी ,कमर में करधनी ,बक्ष उन्नत, नासिका सुडोल,मंद मुसकान और नशीले नेत्र थे | असुर उस संध्या रुपी सुन्दरी पर मोहित हो गए और उसे ही स्त्री समझ कर ” तुम कौन हो,किस की पुत्री हो ? ” आदि कह कर उस के पीछे दौड़े पड़े | इस प्रकार भगवान ने ब्रह्मा जी की रक्षा की ,मूर्ख असुरों ने संध्या को ही स्वीकार कर लिया |
५. गन्धर्व,अप्सरा ,भूत प्रेत और पितरों की सृष्टि –
इस के बाद ब्रह्मा जी ने अपनी हास्य विनोद की वृति से गन्धर्व और अप्सराओं की सृष्टि की | उन्होंने अपना चंद्रमा के समान मनोहर शरीर त्याग दिया , जिसे विश्वावसु आदि गन्धर्वों ने प्रसन्नता से ले लिया | अपनी निंद्रा और आलस्य से ब्रह्मा जी ने भूत प्रेतों को उत्पन्न किया | उन का वह जंभाई वाला शरीर देख कर आँखें मूँद ली | भूत प्रेतों ने उस शरीर को ले लिया ,जिस में जीवों को निंद्रा और उन्माद उत्पन्न होता है | अपनी अन्तर्धान शक्तियों से ब्रह्मा जी ने साध्य और पितरों की सृष्टि की | पितरों ने वह अदृश्य शरीर ग्रहण किया ,इसलिए श्राद्ध में पितरों को हव्य -कव्य दिया जाता है | उसी शक्ति से सिद्ध और बिद्याधरों की सृष्टि हुई |
६. किन्नर,किम्पुरुष,नाग और मनु की सृष्टि –
अपने प्रतिबिम्ब को देख कर आत्म प्रशंसा से ब्रह्मा जी ने किन्नर और किम्पुरुष को रचा ,उन्होंने अपना वह प्रतिबिम्ब वाला शरीर त्याग दिया | जब सृष्टि विस्तार नहीं हो रहा था तब ब्रह्मा जी चिंता से लेट गए और क्रोध में अपना शरीर त्याग दिया | उस शरीर के बाल सर्प बने और क्रोध से क्रूर सर्प,नाग उत्पन्न हुए |
अंत में ब्रह्मा जी को लगा कि कार्य सिद्ध हो गया ,तब उन्होंने अपने मन से मनुओं को उत्पन्न किया | मनु मानव सृष्टि के प्रवर्तक हैं | ब्रह्मा जी ने अपना मानुष शरीर मनुओं को दे दिया |पूर्व उत्पन्न सभी जीवों ने मनु को देख कर ब्रह्मा जी की प्रशंसा की,”हे जगत स्त्रष्टा,आप ने बहुत सुन्दर रचना की है |”
इस के बाद ब्रह्मा जी ने तप,ज्ञान,भक्ति और योग से उत्पन्न ऋषि सर्ग की रचना की -मरीचि,अत्री,वशिष्ठ आदि सप्तऋषियों को अपने शरीर के विभिन्न योगमय अंशों से उत्पन्न किया |
सार और आध्यात्मिक संदेश-
इस अध्याय का गूढ़ संदेश यह है कि ब्रह्मा जी की प्रत्येक सृष्टि वास्तव में मन की एक वृति है |श्रीधर स्वामी जी अपनी भावार्थ दीपिका टिका में कहते हैं कि शरीर त्यागने का अर्थ मन की उस वृति को छोड़ना है | रात्रि,दिन,संध्या,निंद्रा अहंकार -यह सब हमारे भीतर ही हैं | जब तक जीव इन वृतियों में फंसा रहता है ,वह भटकता है “जब वह भगवान विष्णु की शरण लेता है ,तभी वह कामरूपी असुरों से बच पाता है |
इस प्रकार तृतीय स्कन्ध का बीसवां अध्याय हमें सिखाता है कि सारी सृष्टि भगवान की लीला है और शुद्ध मनु सृष्टि अर्थात धर्मयुक्त मानवीय जीवन ही भगवान को प्रिय है|
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे विंशोSध्याय: || २०||
लेखक- मदन लाल शर्मा
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