सयुम्वा रैक्स का आत्म-चिन्तन -जानियें जीवन असफलता ,रिश्तों और लेखन के बारे में मेरे व्यक्तिगत अनुभव और विचार |

जीवन,लेखन और मौन के बीच एक यात्रा –

प्रस्तावना- आत्मचिंतन सब से कठिन लेखन है |दूसरो के बारे में लिखना आसान है ,क्यों कि वहां तथ्य होते हैं ,घटनाएँ होती हैं | अपने बारे में लिखते समय तथ्य और भावना एक दुसरे में उलझ जाते हैं | मैं सयुम्वा रैक्स ,आज इस पृष्ठ पर अपने आप से ही संवाद कर रहा हूँ | यह कोई आत्म प्रशंसा नहीं है न ही आत्म दया |यह केवल एक पडाव है जहाँ रुक कर मैं पीछे मुड कर देखना चाहता हूँ कि मैं कहाँ से चला था ,कहाँ पहुंचा हूँ और अब कहाँ जाना चाहता हूँ |अगर आप मुझे पहली बार पढ़ रहे हैं ,तो मैं आप को बता दूं -मैं कोई प्रसिद्ध व्यक्तित्व नहीं हूँ | मैं एक साधारण मनुष्य हूँ जिस ने शब्दों को अपना साथी बनाया है | जीवन ने मुझे जितना सिखाया है उतना ही मैंने लिखने की कोशिश की है |

१- मेरा नाम ,मेरी पहचान का पहला प्रश्न -लोग अक्सर पूछते हैं -सयुम्वा रैक्स ,यह कैसा नाम है ?क्या इस का कोई अर्थ है ?

सच कहूँ तो इस नाम में ही मेरा आत्म चिन्तन छुपा है ,सयुम्वा मेरे लिए सहनशीलता ,जुड़ाव और निरन्तरता का प्रतीक है | जैसे पहाड़ों में बहने वाली हवा जो कभी रूकती नहीं कभी थकती नहीं और रैक्स मेरे अन्दर का वह साहस है जो हर बार गिर कर फिर खड़े होने की शक्ति देता है | मैंने जीवन में सीखा है कि नाम से पहचान नहीं बनती ,पहचान से नाम बनता है | मैंने अपने नाम का अर्थ देने के लिए ही पूरा जीवन जिया है जब मैं छोटा था तो सोचता था कि बड़ा आदमी बनूगा ,बाद में समझ आया कि बड़ा आदमी बनने से ज्यादा जरूरी है -सच्चा आदमी बनना |

2 – जीवन की पाठशाला -जहाँ डिग्रियां नहीं मिलती –

मैंने कोई बड़ी विश्वविद्यालय की डिग्री नहीं ली ,पर जीवन ने मुझे जो पाठशाला दी,उस की कोई तुलना नहीं है |

पहला पाठ- अभाव से सीखना – मेरे बचपन में सुविधाए बहुत कम थीं ,उस अभाव ने ही मुझे सिखाया कि ख़ुशी वस्तुओं में नहीं ,दृष्टिकोण में है ,एक फटी किताब को भी मैं तीन तीन बार पढ़ता था |उसी ने मुझे शब्दों का मूल्य सिखाया | आज जब सब कुछ एक क्लिक पर उपलब्ध है ,तो मैं देखता हूँ कि लोगों के पास जानकारी तो बहुत है ,पर ज्ञान कम है |

दूसरा पाठ- असफलता ही गुरु है ,मैं अपने जीवन में कई बार असफल हुआ हूँ | नौकरी में,सम्बन्धों में लेखन में ,एक समय ऐसा भी आया जब मैंने जो लिखा ,उसे किसी ने नहीं पढ़ा | मेरे लेख लौटाए गये | उस समय मुझे लगा कि सब खत्म हो गया पर आज जब पीछे देखता हूँ तो समझ आता है कि वे ही अस्विकृतियाँ मेरी सब से बड़ी शिक्षक थी |उन्हों ने मुझे अहंकार से मुक्त किया और धैर्य सिखाया |सफलता हमें तालियाँ देती है,पर असफलता हमें समझ देती है |

तीसरा पाठ- मौन की शक्ति – इस शोर भरी दुनिया में हम सब बोलना चाहते हैं ,सुनना कोई नहीं चाहता | मैंने एक लम्बा समय एकान्त में बिताया ,हिमालय की घाटियों में ,जहाँ नेटवर्क नहीं था पर आत्मा से कनेक्शन था | वहां मैंने सिखा कि मौन खालीपन नहीं है ,मौन भरा पूरा है | जब आप चुप होते हैं तब आप पहली बार खुद की आबाज सुन पाते हैं ,मेरा अधिकांश लेखन उसी मौन से जन्मा है |

3- लेखन मेरे लिए क्या है ?

बहुत से लोग मुझ से पूछते हैं आप क्यों लिखते हैं ?क्या पैसों के लिए,प्रसिद्धि के लिए ? मैं लिखता हूँ क्यों कि न लिखूं तो मेरा दम घुटने लगता है |लेखन मेरे लिए आक्सीजन है| जब मन में विचारों का तूफ़ान चलता है ,जब दुनिया की विसंगतियाँ मुझे बैचैन करती हैं,जब मैं किसी की पीड़ा देखता हूँ और कुछ कर नहीं पाता ,तब मैं लिखता हूँ | मेरे लिए लेखन तीन स्तरों पर काम करता है –

क – स्वयं के लिए चिकित्सा – जो बात मैं किसी से कह नहीं सकता,वह मैं कागज से कह देता हूँ |लिखने के बाद मन हल्का हो जाता है |

ख – समाज के लिए दर्पण – मैं कोशिश करता हूँ कि मेरे लेखन में समाज का सच दिखे |मीठा झूठ लिखना आसान है ,कडवा सच लिखना कठिन है |मैंने हमेशा दूसरा मार्ग चुना है |

ग – भविष्य के लिए दस्तावेज – आज जो हम जी रहे हैं ,वह कल इतिहास बन जाएगा |मैं चाहता हूँ कि मेरी आने वाली पीढ़ी जब मेरे लेख पढ़े ,तो उसे पता चले कि हम ने किन परिस्थितियों में क्या सोचा था | मैं मानता हूँ कि एक लेखक की सब से बड़ी जिम्मेवारी ईमानदारी है ,अपने पाठकों के प्रति और अपने शब्दों के प्रति |

४ – रिश्ते,समाज और बदलती दुनिया

८२ वर्ष के जीवन अनुभव वाले एक बजुर्ग की तरह मैं भी देख रहा हूँ कि दुनिया कितनी तेजी से बदल रही है |तकनीक ने हमें जोड़ने का वादा किया था ,पर कई बार मुझे लगता है कि हम अधिक अकेले हो गए हैं |एक ही घर में चार लोग हैं और चारों ही अपने अपने मोबाइल में व्यस्त हैं ,हम कनेक्ट तो हैं ,पर जुड़े हुए नहीं हैं |

इस आत्म चिन्तन में मैं स्वयं से पूछता हूँ -क्या मैंने अपने रिश्ते निभाये? जबाब है -पूरी तरह नहीं ,कई बार मैं अपने आप में इतना व्यस्त हो गया कि अपने अपनों को समय नहीं दे पाया |यह मेरी सब से बड़ी गलती है और सब से बड़ा सीख भी |काम जरूरी है ,पर काम ही सब कुछ नहीं है |अंत में आप के साथ आप के लोग ही रहते हैं ,आप की उपलब्धियां नहीं |

आज के युवाओं को देखता हूँ तो दो बातें मन में आती हैं ,एक तरफ उन की उर्जा,उन का आत्म विश्वास देख कर ख़ुशी होती है, दूसरी तरफ उन कि बैचैनी देख कर चिंता है |सब को सब कुछ जल्दी चाहिए | पर जीवन जल्दी का खेल नहीं है ,यह धैर्य का तप है | पहाड़ पर चढने में समय लगता है ,जो जल्दी उपर पहुंचना चाहता है ,वे अक्सर बीच में ही थक कर बैठ जाते हैं |

५ -मेरी कमजोरियां -जिन्हें मै स्वीकार करता हूँ |

आत्म चिन्तन तब तक अधूरा है जब तक हम अपनी कमजोरियों की स्वीकार न करें | मैं बहुत भावुक हूँ ,छोटी छोटी बातें दिल पर ले लेता हूँ | मैं सब को खुश करने की कोशिश करता हूँ , जो असंभव है | इस कोशिश में कई बार मैं स्वयं को ही दुखी कर लेता हूँ |मैं जिद्दी भी हूँ ,जो बात मन में ठान लेता हूँ उसे कर के ही मानता हूँ ,चाहे दुनिया कुछ भी कहे ,इस जिद्द ने मुझे कई बार नुक्सान भी पहुंचाया है ,पर इस जिद्द ने मुझे लेखन में व्यस्त रहने की शक्ति भी दी है |और सब से बड़ी कमजोरी -मैं माफ़ करना जल्दी सीख नहीं पाया |मैंने कई कडवी बातों को वर्षों तक मन में रखा | अब समझ आ रहा है कि माफ़ न करने से सामने वाले को नहीं ,स्वयं को ही सजा मिलती है |अब मैं सीख रहा हूँ,छोड़ना |

६ – आगे का रास्ता-मैं क्या चाहता हूँ ?

इस पहाड़ पर खड़े हो कर जब मैं आगे देखता हूँ तो मेरे मन में कोई इच्छा नहीं है | मुझे बंगला ,गाडी,पुरस्कार नहीं चाहिए | बस मैं इतना चाहता हूँ कि मेरे शब्द किसी एक व्यक्ति के जीवन में थोडा सा उजाला ला सकें तो मेरा लिखना सार्थक हो जाएगा |मैं चाहता हूँ कि मैं अंतिम क्षण तक सीखता रहूँ |एक छात्र की तरह ,क्यों कि जिस दिन हम ने सीखना छोड़ दिया ,उस दिन हम बूढ़े हो गए,चाहे उम्र कुछ भी हो | मैं चाहता हूँ कि मैं सरलता की और लौट सकूं ,कम जरूरतें ,कम शोर,ज्यादा शान्ति ,पहाड़ों में एक छोटा सा घर ,कुछ कितावें,कुछ सच्चे लोग और चाय का एक कप -मेरे लिए इतना ही बहुत है |

मैं अपने पाठकों से ,अपने चाहने वालों से यही कह्ना चाहता हूँ -अपने आप से बात करना सीखिए | रोज् दस मिनट,बिना मोबाइल ,बिना किसी शोर के,बस अपने साथ बैठिये ,पूछिए अपने आप से -मैं आज खुश हूँ ?मैं सही दिशा में जा रहा हूँ ?मैं जो कर रहा हूँ ,क्या वही मैं करना चाहता था ? यह आत्म चिन्तन ही हमें भटकने से बचाता है |

उपसंहार -स्युम्बा रैक्स का आत्म चिन्तन कोई समाप्ति नहीं है ,यह एक नई शुरुआत है | जीवन एक नदी की तरह है ,यह बहती रहती है |हम इस में बार बार दुबकी लगाते हैं ,कभी किनारे पर बैठते हैं ,कभी लहरों से लड़ते हैं |

यदि आप यह लेख पढ़ रहे हैं तो मैं आप का आभारी हूँ कि आपने अपने व्यस्त समय में से कुछ क्षण मेरे मन की यात्रा के लिए दिए |मेरा यह लेख मेरी वेबसाइट पर केवल शब्दों के रूप में न रहे ,बल्कि एक जीवंत संवाद बने | आप भी अपना आत्म चिन्तन कीजिये और यदि मन करे तो मुझ से सांझा कीजिये | क्यों कि अंत में हम सब एक ही प्रश्न के उतर खोज रहे हैं -मैं कौन हूँ ? मैं यहाँ क्यों हूँ ? इसी प्रश्न की खोज में ही जीवन की सारी सुन्दरता छिपी है |

नोट- यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों पर आधारित है |

लेखक- मदन लाल शर्मा

वेबसाइट-http://thegodweknow.com -अगले सप्ताह एक और आत्म चिन्तन

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