देवहूति को तत्वज्ञान एवं मोक्ष पद की प्राप्ति
भूमिका
श्रीमद्भागवत पुराण के तृतीय स्कन्ध का तेतीस्वां अध्याय भारतीय अध्यात्म परम्परा में माँ के मोक्ष का अद्वितीय अध्याय है |इस अध्याय का केंद्र -एक माता देवहूति ,जो पुत्र को जन्म देती है ,पर वह पुत्र साधारण नहीं ,साक्षात विष्णु अवतार भगवान कपिल है |यहीं पर लौकिक माँ का अलौकिक शिष्यत्व में बदल जाता है |माता शिष्या बनती है और पुत्र गुरु बन कर तत्व ज्ञान दे कर मोक्ष पद तक पहुंचाता है |इस कथा में सांख्य दर्शन का सार,भक्ति योग की सरलता और एक स्त्री की कठोर साधना द्वारा परम सिद्धि प्राप्त करने की सम्पूर्ण यात्रा है |
देवहूति कौन है -मोह से मुक्ति की पात्रता
देवहूति स्वायम्भुव मनु और सतरूपा की पुत्री थी |उन का विवाह कर्दम ऋषि से हुआ |कर्दम ऋषि ने गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए उन्हें सभी दिव्य भोग प्रदान किये ,विमान में बैठा कर समस्त लोको की यात्रा करवाई |नौ पुत्रियों के बिवाह के पश्चात जब कर्दम सन्यास लेना चाहते थे |तब भगवान के वरदान से स्वयं विष्णु उन के पुत्र रूप में अवतरित हुए-कपिल मुनि | परन्तु भोगों के बीच भी देवहूति के हृदय में शून्यता थी ,उन्हें अनुभव हो रहा था कि यह सुन्दर शरीर यह महल,यह विमान सब नश्वर हैं | वे अपने पति से कहती हैं कि मुझे इन भोगों से वैराग्य हो गया है ,मुझे अब तत्व ज्ञान चाहिए |यही जिज्ञासा उन्हें तत्व ज्ञान की सच्ची अधिकारिणी बनाती है |भागवत में स्पष्ट कहा है कि भोग से वैराग्य और वैराग्य से जिज्ञासा उत्पन्न होती है ,तभी गुरु ज्ञान देता है |देवहूति उसी उच्च भूमिका पर थी |
कपिल द्वारा देवहूति को तत्व ज्ञान का उपदेश-सांख्य का सार –
बिंदु सरोवर आश्रम में एक दिन देवहूति ने अपने पुत्र कपिल से एकांत में पूछा -हे प्रभो,आप तो साक्षात ब्रह्म हो,मुझे इस संसार के बंधन से मुक्त करवाइए |मैं घोर अन्धकार में पड़ी हूँ |प्रकृति और पुरुष क्या है ?मैं कौन हूँ ? यह संसार क्या है ,बंधन क्या है और मोक्ष कैसे होगा ?
तब करुणा निधान कपिल मुनी जी ने अपनी माता को तत्वज्ञान देना प्रारम्भ किया ,जो पिछले अनेक अध्यायों में विस्तार से आया है ,पर तेतीसवें अध्याय में सार और फल बताया गया है | कपिल ने कहा -हे माते यह सम्पूर्ण जगत प्रकृति का खेल है | प्रकृति त्रिगुणात्मक है -सत्व,रज,तमस | इसी से महा तत्व ,अहंकार पंच तन्मात्रा ,पंच महाभूत ,ग्यारह इन्द्रियां और मन की उत्पति होती है | यह चौविस तत्व जड है |पच्चीसवां तत्व पुरुष है | जो चेतन है ,साक्षी है ,निर्लेप है |जीव जब अपने को प्रकृति के इन तत्वों से बना हुआ शरीर मान लेता है ,तब वह बन्ध जाता है | लेकिन जव वह विवेक से अपने को पुरुष,आत्मा ,ब्रह्म से अलग जान लेता है ,तब वह मुक्त हो जाता है |
हे माता,बंधन का कारण है अहंकार और ममता -मैं और मेरा | यह शरीर मैं हूँ ,यह घर मेरा है ,यह पुत्र मेरे हैं -इसी से जीव जन्म मरण के चक्र में घूमता है | जीव गर्भ में कितना कष्ट पाता है ,जन्म ले कर माया में कैसे फंसता है ,यह सब मैंने तुम्हें बताया ,अब मुक्ति का मार्ग सुनो |
मुक्ति का मार्ग है -ज्ञान,वैराग्य और भक्ति का समन्वय | केवल शुष्क ज्ञान से अहंकार बढ़ता है ,इसलिए भक्ति आवश्यक है |
भक्ति योग_ तत्व ज्ञान को मोक्ष में बदलने वाला अमृत
देवहूति ने कहा _हे पुत्र ,आप का बताया सांख्य ज्ञान अत्यंत कठिन है मेरी बुद्धि स्त्री स्वभाव वाली है इसे धारण करना कठिन है ,कोई सरल उपाए बताइए |
तब कपिल जी ने भक्ति योग को ही तत्व ज्ञान का परिपाक बताया |उन्होंने कहा -हे जननी ,जो व्यक्ति समस्त कर्मों को मेरे अर्पण कर देता है ,जो सब में मुझ को देखता है ,जो किसी से द्वेष नहीं करता ,जो सत्य,दया,सोच,तितिक्षा से युक्त है ,जो सत्पुरुषों का सत्संग करता है और निरन्तर मेरी कथा सुनता है ,उस की भक्ति शीघ्र सिद्ध हो जाती है | भक्ति भी दो प्रकार की होती है -सकाम और निष्काम |सकाम भक्ति में भक्ति का उद्देश्य होता है मनुष्य भगवान् से कुछ मांगता है ,उसे स्वर्ग चाहिए ,मिलता तो है लेकिन वह फिर लौट आता है |निष्काम भक्ति में भक्त कुछ नहीं मांगता केवल कहता है -हे प्रभो ,मैं आप का हूँ ,ऐसी भक्ति से प्रकृति के गुण स्वत: क्षीण हो जाते हैं ,भक्ति की अग्नि में लिंग शरीर रुपी लकड़ी जल जाती है |
हे माता,तुम भक्ति का आश्रय लो ,यह बिंदु सरोवर सिद्ध क्षेत्र है |यहाँ रह कर तुम एकाग्र चित से मेरा ध्यान करो | मन को मुझ में लगाओ ,इन्द्रियों को वश में करो ,आसक्ति को त्याग दो ,इस से तुम्हारा अंत करण शुद्ध होगा और तत्व ज्ञान अनुभव से बदल जाएगा | ज्ञान जब तक अनुभव नहीं बनता ,तब तक मोक्ष नहीं देता |भक्ति ही ज्ञान को अनुभव बनाती है |
गुरु ऋण से मुक्ति और सन्यास की अनुमति
तत्व ज्ञान का उपदेश पूर्ण होने पर कपिल जी ने अपनी माता से कहा -हे माता ,अब मेरा अवतार कार्य पूरा हुआ ,मैंने तुम्हें वह ज्ञान दे दिया जो बड़े बड़े मुनियों को भी दुर्लभ है |अब मुझे लोक कल्याण के लिए सन्यास ले कर विचरण करना है | आप मुझे अनुमति दें | यह क्षण अति भाबुक था | देवहूति जानती थी कि पुत्र साक्षात भगवान हैं ,परन्तु माता का हृदय वियोग से भर गया |फिर भी उन्होंने विवेक का आश्रय लिया |उन्होंने कहा -हे परमेश्वर ,आप जहाँ जाएँ,आप का मंगल हो |आप ने मुझे घोर संसार सागर से पार लगा दिया |इस से बड़ा पुत्र धर्म क्या हो सकता है | कपिल जी ने माता की परिक्रमा कर,प्रणाम कर उतर पूर्व दिशा में गंगा सागर की और चले गए |आज भी वहां कपिल मुनी का आश्रम इस कथा का साक्षी है |
देवहूति की साधना-ज्ञान का तप से तपाना
पुत्र के जाने के बाद देवहूति ने तत्व ज्ञान को जीवन में उतारना प्रारम्भ किया |यह इस अध्याय का सब से प्रेरणादायक भाग है -ज्ञान सुनना एक बात है और उसे जीना दूसरी बात | उन्होंने क्या किया ?पहला-स्थान शुद्धि और एकांत वास | वे उसी बिंदु सरोवर आश्रम में रहीं |उन्होंने दिव्य महल के भोगों को त्याग दिया |वह साधारण वत्क्ल धारण करने लगी |दूसरा देहाभिमान का त्याग,उन्होंने केशों को बांधना ,श्रृगार करना छोड़ दिया |शरीर कृष हो गया ,परन्तु मुख पर ब्रह्म तेज बढ़ गया |तीसरा-अष्टांग योग का अभ्यास -यम,नियम ,आसन,प्राणायाम ,प्रत्याहार ,धारणा ,ध्यान और समाधि का मार्ग बताया था ,उस का वे नित्य अभ्यास करने लगी |वे ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर बिंदु सरोवर में स्नान करती ,भगवान विष्णु की मूर्ती को तुलसी,पुष्प,जल अर्पित करती और घंटों ध्यान में बैठती | चौथा – अनासक्ति और सिद्धियों का त्याग,योग के प्रभाव से उन्हें अणिमा ,लघिमा,प्राप्ति,प्राकाम्य,महिमा,ईशित्व,वशित्व कामावसायिता,-यह आठ सिद्धियाँ प्राप्त हो गईं |देवताओं ने आ कर उन की पूजा करनी चाहि ,परन्तु देवहूति ने कहा -मुझे ये नहीं चाहिए ,मुझे तो भगवान के चरण चाहियें |उन्होंने सिद्धियों को तिनके के समान त्याग दिया |यही सच्ची वैराग्य सिद्धि है | इस प्रकार कई वर्षों तक निरन्तर अभ्यास से उन का चित दर्पण की तरह साफ हो गया | रज और तम गुण क्षीण हो गये |सत्व गुण बढ़ गया और सत्व को भी लांघ कर वे त्रिगुणातीत अवस्था में पहुंच गईं |
मोक्ष पद की प्राप्ति -ब्रह्म में लय
जब चित पूर्ण शुद्ध हो गया,तब देवहूति को वह अनुभूति हुई ,जिस का वर्णन कपिल जी ने किया था |समाधि अवस्था में उन्हें अपने हृदय में भगवान के चतुर्भुज स्वरूप के दर्शन हुए शंख,चक्र ,गदा,पद्म धारी,पीत् वस्त्र धारी ,मंद मुस्कान वाले करुणा भरे नेत्रों वाले श्री विष्णु | उस दर्शन से उन का लिंग शरीर ,मन,बुद्धि ,अहंकार ,चित का समूह-योगाग्नि में जल गया,जैसे बांस की रगड से उत्पन्न अग्नि बांस को ही जला देती है ,वैसे ही ज्ञान की अग्नि ने अविद्या को जला दिया | वे जिवनोमुक्त हो गई|शरीर रहते हुए भी वे मुक्त थीं,उन्हें भूख प्यास,मान अपमान ,शीत उष्ण का बहन नहीं रहा |वे कभी बालकों के समान हंसती, कभी जडवत बैठी रहती ,क्यों कि उन की दृष्टि में अब द्वैत नहीं रहा
अंत में उन का शरीर ब्रह्म में लीन हो गया |भागवत में वर्णन है कि उन का शरीर योगाग्नि से भस्म हो कर पंच भूतों में मिल गया और उस स्थान पर जो जल बहा ,वह सिद्ध नदियों के रूप में प्रसिद्ध हुआ |उस क्षेत्र का नाम सिद्धपद पड़ा,जहाँ स्नान करने से मनुष्य को सिद्धि प्राप्त होती है | जहाँ आज भी कपिल धारा और देवहूति आश्रम तीर्थ रूप में मौजूद है |
इस कथा का सदेश –
तेतीसवें अध्याय का संदेश केवल देवहूति की व्यक्तिगत मुक्ति नहीं है ,एक -गुरु चाहे पुत्र ही क्यों न हो ,यदि वह तत्व वेता है तो उसे गुरु मानना चाहिए |दो- तत्व ज्ञान सुनने के बाद साधना अनिवार्य है ,तीन-स्त्री या पुरुष कोई भी भक्ति योग से मोक्ष प्राप्त कर सकता है चार- सच्चा वैराग्य सिद्धियों को भी ठुकरा देता है | इसलिए इस अध्याय का पाठ और प्रकाशन परम पुण्यदायी है |कपिल और देवहूति का यह संवाद सदा के लिए माँ के मोक्ष का आदर्श बना रहेगा |
इति श्रीमद्भागवते महापुराण पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे त्रयत्रिशोSध्याय: ||३३||
इति तृतीय: स्कन्ध: समाप्त: |
लेखक- मदन लाल शर्मा
वेबसाइट-http://thegodweknow.com -चतुर्थ स्कन्ध का प्रथम अध्याय – स्वायम्भव मनु की कन्याओं के वंश का वर्णन |
