अष्टावक्र गीता -2
आत्म-ज्ञान का अनुभव –
यह प्रकरण राजा जनक के आत्म अनुभव का वर्णन है |प्रथम प्रकरण में अष्टावक्र जी ने ज्ञान दिया ,द्वितीय प्रकरण में जनक जी कह रहे हैं,अब मुझे ज्ञान अनुभव आ गया है |
श्लोक १ से 25 तक का सामान्य अर्थ –
श्लोक – अहो निरंजन:शान्तो बोधोSहं प्रकृते: पर: | एतावन्तमहं काल मोहेनैव बिडम्बित: ||१||
अर्थ-अहो,मैं कितना आश्चर्य चकित हूँ| मैं कलंक रहित,असीम,शुद्ध स्वरूप हूँ | मैं माया से परे हूँ और केवल ज्ञान स्वरूप हूँ|मैं अतीत कर्म मोह में पड़ा था |
श्लोक- यथा प्रकाशयाम्येको देह्मेंन तथा जगत | अतो मम जगत्सर्वमयथवा न वह किंचन ||2|||
अर्थ- हे गुरु देव जिस प्रकार मेरी देह अपने ही प्रकाश से प्रकाशित हो रही है उसी प्रकार सम्पूर्ण जगत भी वैसे ही मुझ में कल्पित है |अर्थात यह जगत मेरा है या मेरा कुछ भी नहीं है |
श्लोक-सशरीरमहो विश्वं परित्यज्य मयाSधुना | कुतश्चित कौशलदेव परमात्मा विलोक्यते ||3||
अर्थ- जैसे इक्षु के रस से बनी शक्कर उसी रस में व्याप्त है ,वैसे ही यह सारा विश्व मुझ से ही उत्पन्न हो कर मुझ में ही व्याप्त है | मैं ही इस का आधार हूँ |
श्लोक-यथा न तोयतो भिंन्नास-तरंगा: फेन बुदबुदा: | आत्मनो न तथा भिन्न विश्वमात्मविनिर्गतम ||४||
अर्थ- आत्मा को न जानने से ही संसार प्रतीत होता है ,और आत्मा को जान लेने पर संसार नहीं रहता | जैसे रस्सी को न जानने से सांप दिखता है और जान लेने पर सांप का भ्रम मिट जाता है |
श्लोक- तंतुमातत्रो भवेदेव पटो यव्द्द्विचारित:|आत्मतन्मात्रमेवेदं तवदद्विश्वंविचारितम ||५||: |
अर्थ- मैं प्रकाश स्वरूप हूँ ,मैंने ही इस संसार को प्रकाशित किया है |जैसे घट को दिया प्रकाशित करता है ,वैसे ही यह सारा संसार मुझ से प्रकाशित है |अत यह जगत मुझ से भिन्न नहीं है | |
श्लोक- यथैवेक्षुरसे क्ल्रिप्ता तेन व्याप्तैव शर्करा | तथा विश्वं मयि क्लरिप्त मया व्याप्तं निरन्तरम “”६||
अर्थ_ अहो,मुझ से कल्पित यह संसार .जैसे सर्प रस्सी में कल्पित है ,वैसे ही मुझ में कल्पित है | मै आनन्द का सागर हूँ,यह जान कर मै परमानन्द में स्थित हूँ |
श्लोक-आत्माSज्ञानाज्जगदभाति आत्म-ज्ञानान्न भासते |रज्जव्ज्ञानादहिर्भाति तज्ज्ञानाद भासते न हि ||7||
अर्थ- मैं आश्चर्य हूँ | मैं एक ,अखंड ,बोध स्वरूप हूँ | मेरे सिबा दूसरा कुछ नहीं,न त्यागने योग्य न ग्रहण करने योग्य | जब तक आत्म ज्ञान नहीं होता भ्रम की स्थिति बनी रहती है | जैसे ही ज्ञान होता है भ्रम मिट जाता है सत्य का ज्ञान हो जाता है |
श्लोक-प्रकाशो में निजं रूपं नातिरिक्तोSस्म्यहं तत: |यदा प्रकाशते विश्वं तदाSहंभास एव हि ||८||
अर्थ-मै ज्ञान स्वरूप हूँ,यह शरीर ,यह संसार जड है | अहो, यह कैसा आश्चर्य है कि लोग शरीर को ही आत्मा समझ कर इस की पूजा में लगे हैं |
श्लोक- अहो विकल्पित विश्वंज्ञानान्मयी भासते |रूप्यं शुक्तौ फणी रज्जौ वारि सूर्यकरे यथा ||9||
अर्थ- जैसे हवा चलने से आकाश में बादल आते जाते हैं ,वैसे ही मेरे अचल ,आकाशवत स्वरूप में मन के कारण यह सारा संसार आता जाता प्रतीत होता है | श्लोक- मतो विनिर्गत विश्वं मय्येव लयमेष्यती |मृदी कुम्भो जले वीचि: कनके कटंक यथा ||10||
अर्थ- जैसे आकाश से धुंए से लेकर मेघ तक सारी वस्तुएं उत्पन्न होती हैं ,और उसी में लीन होतीहैं,वैसे ही मुझ आत्मा से ही यह सारा जगत उत्पन्न होता है और मुझ में ही लीन हो जाता है |
श्लोक- अहो अहं नमो महान विनाशो यस्य नास्ति में |ब्रह्मादिस्तंबपर्यन्त जगन्नाशेSपि तिष्ठत: || ११||
अर्थ- जैसे विभिन्न आभूषण -कंगन,बाजूबंद,हार सब सोने से बने होते हैं ,सोने से भिन्न नहीं ,वैसे ही ब्रह्मा से ले कर तिनके तक सारा जगत मुझ आत्मा से ही है,मुझ से भिन्न नहीं |
श्लोक-अहो अहं नमो महान एकोSहं देहवानपि | क्वचिन्न गन्ता नाग्नता व्याप्य विश्वमवस्थित : ||12||
अर्थ-अहो, मैंने संसार का त्याग करके भी कितनी भूल की ,क्यों कि यह सारा संसार मेरा ही तो है | जैसे सांप रस्सी को छोड़ कर कहाँ जाएगा ? यह संसार मुझ से अलग है ही नहीं |
श्लोक- अहो अहं नमो महा दक्षो नास्तीह मत्सम:|| असंस्पृश्य शरीरेण येन विश्वं चिर धृतम ||१३||
अर्थ- अहो,मैं शरीर नहीं हूँ| मैं बोध स्वरूप हूँ | मैं पहले जीने की इच्छा करता था ,अब जीने मरने का भय चला गया |
श्लोक-अहो अहं नमो मह्यं यस्य में नास्ति किंचन | अथवा यस्य मे सर्व यद वाड़मनसगोचरम || १४ ||
अर्थ-जैसे नदी ,फेन,लहर और बुलबुले पानी से अलग नहीं हैं वैसे ही यह सारा संसार जो आत्मा से उत्पन्न हुआ है,आत्मा से अलग नहीं है |
श्लोक-ज्ञान ज्ञेयतथा ज्ञाता त्रितयं नास्ति वास्तवं | अज्ञानाद भाति यत्रेदं सोSहमस्मि निरंजन ||१५||
अर्थ-जैसे कपड़े का विचार करने पर पता चलता है कि वह केवल धागा ही है ,वैसे ही इस संसार का विचार करने पर पता चलता है कि वह केवल आत्मा ही है |
श्लोक-द्वैतमूलमहो दुःख नान्य तस्याSस्ति भेषज | दृश्यमेतन मृषा सर्व एकोSहं चिद्र्सोSमल: ||१६ ||
अर्थ-जैसे गन्नों के रस से बनी शक्कर के बारे में सोचने पर वही रस याद आता है वैसे ही मेरे बारे में सोचने पर यह सारा जगत ही मेरा विस्तार लगता है
श्लोक-बोधमात्रोSहमज्ञानाद उपाधि: कल्पितो मया | एवं विमृश्यतो नित्यं निर्विकल्पे स्थितिर्मम || १७||
अर्थ-आत्मा को न जानने से संसार भासता है,जान लेने पर नहीं भासता |जैसे रस्सी को न जानने से सांप भासता है और जान लेने पर नहीं भासता |
श्लोक-अहो मयि स्थितं विश्वं वस्तुतो न मयि स्थितम | न में बन्धोSस्ति मोक्षो वा भ्रान्ति: शान्तो निराश्रया ||१८||
अर्थ-मैं प्रकाश हूँ ,मैं ही ज्ञान हूँ |मुझ से ही यह सब प्रकाशित है | मैं ही सब कुछ हूँ| यह सारा संसार मेरा है,अथवा कुछ भी मेरा नहीं है |दोनों ही सच है |
श्लोक -सशरीरमिदं विश्वं न किंचदिति निश्चितं |शुद्धचिन्मात्र आत्मा च तत्कस्मिन कल्पनाSधुना ||१९||
अर्थ- जो दिखाई दे रहा है वह, वह नहीं है यह परम सच्चाई है |कल्पना द्वारा कल्पित संसार दिखाई दे रहा है केवल आत्मा ही चैतन्य है
श्लोक-शरीरं स्वर्गंनरकौ बन्धमोक्षो भयं तथा |कल्पनामात्रनेवेतत कि में चिदात्मन: ||२०||
अर्थ- अहो,यह श्री ,यह स्वर्ग नरक ,यह बंधन मोह ,यह सब कल्पना मात्र हैं | मैं तो शुद्ध चैतन्य स्वरूप हूँ ,इस में क्या कल्पना करनी |
श्लोक -अहो जनसमूहेSपि न द्वैतं पश्यतो मम |अरण्यमिव संवृतं क्व रतिं करवान्यहम ||२१||
अर्थ- मैंने देखा कि यह द्वैत -अच्छा बुरा ,सुख दुःख ,अपना पराया सब कल्पना है |मैं एक शुद्ध चेतन ,आन्न्र्द स्वरूप हूँ ,मेरा कोई शत्रु नहीं ,मित्र नहीं |
श्लोक-नाहं देहो न में देहो जीवो नाहमहं हि चित | अयमेव हिमें बन्ध आसीद्या जीविते स्पृहा ||२२||
अर्थ- मैं कर्ता नहीं ,मैं क्रिया रहित हूँ मैं जड नहीं मैं चेतन आत्मा हूँ | मैं संग रहित असंग आत्मा हूँ |
श्लोक-अहो भुवनकल्लोलैर्वीचित्रैर्द्राक समुस्थितं | मध्यनंतमहाम्भोधौ चितवातेस्मुद्य्ते || २३||
अर्थ-मन ही बंधन और मोक्ष का कारण है ,मन से ही संसार की कल्पना की गई है | जब मन शांत हो गया तो मेरे लिए न बंधन है न मोक्ष सब ब्रह्म मय है |
श्लोक – मध्यन्नतमहाम्भौधौ चितवाते प्रशाम्यति | अभाग्याज्जीववणिजो जगत्पोतो विनश्वर:||२४||
अर्थ- मैंने अपने आप को जान लिया है ,न मुझ में कुछ पाने की लालसा है न खोने का भय | मैं पूर्ण हूँ .यह ज्ञान ही मेरा स्वभाव है | अब मैं अपने आत्म आनन्द में मग्न हूँ |
श्लोक-मध्यनन्तमहांभोधा- वाश्चर्य जीववीचय:| उद्यन्ति खेलन्ति प्रविशन्ति स्वभावत: || 25||
मेरे इस महा समुद्र रुपी शरीर में मेरे द्वारा ही अनेक लहरें उठती रहती है भिन्न स्वभाव होने पर भी अंत में मुझ में ही मिल जाती हैं |
अष्टावक्र गीता के २० प्रकरणों में द्वितीय प्रकरण का स्थान अत्यंत महत्व पूर्ण है यदि प्रथम प्रकरण जिज्ञासू का प्रकरण है जहाँ राजा जनक गुरु अष्टावक्र के एक ही उपदेश से आत्म-साक्षात्कार को उपलब्ध हो जाते हैं |इसलिए आत्मानुभूति प्रकरण भी कहा जाता है | इस प्रकरण में कुल २० ही श्लोक हैं और पूरा प्रकरण राजा जनक के मुख से कहा गया है |वह किसी शास्त्र का उद्धरण नहीं बल्कि स्वयं के अनुभव की घोषणा है |
प्रश्न से उतर तक-
१.पहले प्रकरण में जनक ने पूछा था -ज्ञान ,मुक्ति और वैराग्य कैसे प्राप्त हो ?
अष्टावक्र ने जबाब दिया -“तुम शुद्ध चेतना हो ,शरीर नहीं कर्ता ,भोक्ता का भाव छोड़ दो |”
दूसरे प्रकरण की पहली ही पंक्ति में जनक कहते हैं कि गुरु के वचन सुनते ही ज्ञान उन के भीतर उतर गया ,कोई साधना नहीं,कोई तप नहीं ,एक क्षण में बात बन गई |
अहो निरंजन:शान्तो बोधोSहं प्रकृते: | एतावन्तमहं कालं मोहेनैव बिडम्बित: ||
अर्थ-आश्चर्य ,मैं शुद्ध ,शांतऔर बोध स्वरूप हूँ|प्रकृति से परे हूँ| अब तक मैं मोह के कारण व्यर्थ ही भटकता रहा | यह जनक घोषणा करता है कि मेरा असली स्वरूप निरंजन बोध है |
2. मैं शरीर नहीं हूँ -देहाध्यास का खंडन –
जनक सब से पहले शरीर से अपनी पहचान तोड़ते हैं |हम वचपन से मैं मोटा हूँ,मैं बीमार हूँ,मैं जवान हूँ यही सोचते आये हैं | जनक जी कहते हैं –
“यथा प्रकाशयाम्ये देह में न तथा जगत |अतो मर्मब सर्वस्वं अथवा मम किंचन |”
अर्थ- जैसे मैं इस शरीर को प्रकाशित करता हूँ वैसे ही पूरे जगत को |इसलिए सब मेरा है ,अथवा मेरा कुछ भी नहीं है |बहुत गहरी बात है | चेतना के कारण ही शरीर जीवित है | चेतना हट जाए तो शरीर मिट्टी है |,और वही चेतना पूरे जगत को “जान” रही है | इसलिए या तो सब मेरा है क्यों कि सब कुछ चेतना में हो रहा है,या कुछ भी मेरा नहीं क्यों कि मैं किसी से बंधा नहीं | आगे वे कहते हैं -वचपन,जवानी,बुढ़ापा शरीर के हैं | मृत्यु शरीर की है | मैं तो इन सब का साक्षी हूँ | साक्षी कभी बदलता नहीं |
3. संसार का स्वरूप :भ्रम और सत्य –
जनक अब जगत के बारे में बात करते हैं |वेदांत का मूल सिधान्त यहाँ आ जाता है |
” “अहो अहं नमो महंम द्र्श्टूविर्श्रव न विद्यते |अज्ञानाद भाति यत्रेदं सोSहं कस्मै नमो नम: “|
अर्थ-मुझे नमस्कार है | यहाँ देखने योग्य कोई विश्व ही नहीं है | अज्ञान के कारण जो यह प्रतीत हो रहा है था,वह मैं ही हूँ |अब मैं किसे नमस्कार करूं? जनक कहते हैं जैसे रस्सी में सांप का भ्रम होता है ,वैसे ही आत्मा में जगत का भ्रम था |ज्ञान होते ही भ्रम गया |अब न कोई बंधन है न मोक्ष |न कोई गुरु,न कोई शिष्य | वे आगे कहते हैं कि जगत तीन गुणों सत्व,रजस,तमस से बना है ,मैं इन तीनों से परे हूँ | मै साक्षी हूँ ,इसलिए न मैं दुखी हूँ न सुखी ,न कर्ता न भोक्ता |
४.त्याग और ग्रहण से मुक्ति –
आम आदमी का जीवन दो शब्दों से चलता है “यह चाहिए,यह नहीं चाहिए |इसी को राग द्वेष कहते हैं |,ज्ञान की स्थिति क्या है ?जनक कहते हैं –
न में बन्धोSस्ति मोक्षो न भ्रान्ति: शांता: निराश्रया | अहो मयि स्थितं विश्वं वस्तुतो न मयि स्थितं ||
अर्थ-न मेरा कोई बंधन है,न मोक्ष ,भ्रान्ति शांत हो गई ,अब कोई आधार नहीं रहा | आश्चर्य,मेरे में ही यह विश्व स्थित है ,पर वस्तुत: मेरे में स्थित नहीं है | समझिये -समुद्र में लहरें उठती हैं और लीन हो जाती हैं ,पर समुद्र लहरों से बंधा भी नहीं | वैसे ही यह पूरा जगत मुझ चेतना से प्रकट हो रहा है और लीन हो रहा है | पर मैं उस में लिप्त नहीं होता | इस लिए ज्ञानी के लिए न कुछ छोड़ने योग्य है न पकड़ने योग्य | वह स्थितप्रज्ञ हो जाता है |
५. कर्तृत्व का अंत –
हम दुखी क्यों होते हैं ? क्यों की मानते हैं”मैंने किया”| जनक इस “मैं कर्ता हूँ “इस भाव को जड से काट देते हैं |
” नाहं देहो न में देहो जीवो ना हमहं हि चित | अयमेव हि में बन्ध आसीद या जीविते स्पृहा ” ||
अर्थ-न मैं शरीर हूँ,न शरीर मेरा है ,न मैं जीव हूँ मैं तो चेतना हूँ |बस जीने की इच्छा ही मेरा बंधन थी |जब मैं कर रहा हूँ गया ,तब कर्म का फल भी गया |तब चिंता गई| तब भविष्य का डर गया | जो हो रहा है ,प्रकृति के गुणों से हो रहा है | मैं केवल देख रहा हूँ | इसी को गीता में नैष्कर्म्य सिद्धि कहते हैं |
६.स्वभाव स्थिति-सहज समाधि –
बहुत लोग पूछते हैं कि ज्ञान के बाद साधना क्या है ? जनक इस का उतर देते हैं –
“तत्वं भावगत ये न स्वात्मानं तेन नोदितम | किचिद्त्र न कर्तव्यं स्मातिर्प्यन्तरं विना ||”
अर्थ- जिस ने तत्व को नहीं जाना वही कुछ करता है |जिसे आत्मा का ज्ञान हो गया उस के लिए यहाँ कुछ भी करना शेष नहीं |स्मृति मात्र ही बाधा है | ज्ञानी ध्यान करता है ,क्यों कि ध्यान ही अद्वैत है -मै ध्यान कर रहा हूँ,ज्ञानी तो अपने स्वभाव में स्थित है |खाते समय खाना,सोते समय नींद.काम करते समय काम | कोई कर्ता नहीं ,बस प्रवाह है | इसे ही सहज अवस्था कहते हैं |न प्रयास न थकान |
7. गुरु के प्रति कृतज्ञता –
प्रकरण के अंत में जनक गुरु अष्टावक्र के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं –
“नमो नमस्ते गुरवे विवेकिनं मोहं विधूय स्वयमेव बोधयन |त्वत्द्र सादात मया प्राप्तं स्वरूपं यद दुर्लभं सुरैरपि “|
अर्थ-हे गुरु आप को बार बार नमस्कार | आप ने विवेक दे कर मेरा मोह नष्ट किया और स्वयं बोध कराया | आप कि कृपा से मुझे वह स्वरूप प्राप्त हुआ जो देवताओं केलिए भी दुर्लभ है |
यहाँ अहंकार नहीं है ज्ञानी जानता है कि” कृपा ” के बिना यह बात नहीं उतरती | पर साथ यह भी जानता है कि गुरु ने कुछ “दिया” नहीं ,बस जो पहले था उस पर से पर्दा हटाया |
८.द्वितीय प्रकरण का व्यबहारिक निचोड़ -इन पांच बिन्दुओं में समझें –
१,पहचान बदलो -मैं शरीर -मन बुद्धि नहीं,मै शुद्ध साक्षी चेतना हूँ |
2.जगत का सच – जगत आत्मा में कल्पित है|रस्सी सांप वाला खेल है ,ज्ञान से भ्रम मिटता है |
3. बंधन का कारण -“मुझे कुछ चाहिए ” और मैं कर्ता हूँ | बस यही दो गांठें हैं |
४. मुक्ति कैसी होती है -कोई नई व्यवस्था नहीं मिलती ,जो भ्रम था वो हट जाता है |आप पहले से ही मुक्त हैं |
५. जीवन कैसे जियें -बिना कर्ता भाव के ,बिना राग द्वेष के,स्वभाव में स्थित रह कर |
निष्कर्ष -राजा जनक गुरु के वचन सुनते ही आत्म साक्षात्कार को उपलब्ध हो गए |वे बोले -मैं शुद्ध बोध हूँ ,शरीर नहीं,बचपन ,जवानी,बुढापा शरीर के हैं ,मैं साक्षी हूँ | यह जगत रस्सी में सांप जैसा भ्रम है | ज्ञान से भ्रम मिटा ,,न बंधन ,न मोक्ष न कुछ त्यागना ,न पाना | कर्ता भाव गया तो दुःख गया | अब मैं स्वभाव में स्थित हूँ |हे गुरु आप की कृपा से वह मिला जो देवों को भी दुर्लभ है | मैं पहले से ही मुक्त था |
इति द्वितीय प्रकरण -अष्टावक्र गीता |
लेखक-मदन लाल शर्मा
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