अष्टावक्र -4

अष्टावक्र गीता का चतुर्थ प्रकरण ज्ञान की निष्ठा की पराकाष्ठा है |यह जनक की आत्म अनुभूति का साक्षात्कार है |

श्लोक -ह्न्तात्मज्ञस्य धीरस्य खेलतो भोगलीलया | न हि संसारवाहीकैर्मूढे : सह समानता || १||

अर्थ-अष्टावक्र कहते हैं आत्म ज्ञानी धीर पुरुष भोगो को खेल लीला की भान्ति भोगता हुआ भी संसार के भार को ढोने वाले मूढ़ अज्ञानी के समान नहीं है | ज्ञानी संसार में रहते हुए भी संसार में लिप्त नहीं होता |

विवेचना -इस श्लोक में दो प्रकार के जीवन की तुलना की गई है |अज्ञानी व्यक्ति भोग,पद,प्रतिष्ठा को बोझ की तरह ढोता है |उसे पाने की चिंता और खोने का भय -दोनों उसे बांधते हैं | वह संसार रुपी गाड़ी का वाहीक-बैल बन जाता है |परन्तु आत्मज्ञानी जानता है कि मैं देह नहीं,साक्षी चैतन्य हूँ | इसलिए वह संसार को लीला समझता है ,जैसे नाटक में अभिनेता रोता हंसता है पर भीतर जानता है यह अभिनय है वैसे ही ज्ञानी कर्तव्य करता है ,भोगों में रहता है पर आसक्त नहीं होता ||यही जीवन मुक्ति है -संसार त्याग नहीं बल्कि संसार के प्रति दृष्टि का परिवर्तन है ,जब जीवन बोझ न रह कर खेल बन जाए तभी परम शान्ति प्राप्त होती है |

श्लोक- यत पदं प्रेप्सवो दीना: शक्राद्या:सर्वदेवता: | अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुपगच्छति || 2||

अर्थ- जिस परम पद को प्राप्त करने की इच्छा से इन्द्रादि समस्त देवता भी दीन याचक बने रहते हैं ,आश्चर्य है कि उस पद में स्थित योगी किसी प्रकार के हर्ष या गर्व को प्राप्त नहीं करता |

विवेचना- यह श्लोक ब्रह्मनिष्ठा की स्वाभाविकता को दर्शाता है |देवता भी भोग एश्वर्य के प्रतीक हैं ,फिर भी वे अपूर्ण हैं और उस आत्मपद के लिए तरसते हैं |परन्तु ज्ञानी उस पद में प्रतिष्ठित हो गया ,वह हर्षित नहीं होता ,क्यों कि हर्ष तो अभाव के बाद प्राप्ति पर होता है |ज्ञानी के लिए यह प्राप्ति नहीं,अपने स्वरूप की स्मृति मात्र है | जैसे राजकुमार को राज्य मिलने पर नया हर्ष नहीं होता ,वैसे ही ज्ञानी को आत्मस्थिति में कोई उतेजना नहीं यही सच्ची कृतकृत्यता है |जहाँ संसारी व्यक्ति छोटी सिद्धि पर फूल जाता है,वहां योगी परम उपलब्धि पर भी सम और शांत रहता है | यह अकिंचनता ही उस की महिमा है \

श्लोक-तज्ज्ञस्य पुण्यपापाभ्यां स्पर्शो ह्यनतर्न जायते | नहयाकाशस्य धुमेन दृश्यमानापि सडगति: ||3||

अर्थ-उस आत्म-तत्व को जानने वाले के अन्तकरण में पुण्य और पाप का स्पर्श नहीं होता | जैसे आकाश में धुंआ दिखता तो है ,पर उस का आकाश से वास्तवित संयोग कभी नहीं होता |

विवेचना -कर्म का बंधन कर्ता भाव से है | अज्ञानी में कर्ता हूँ;इस अहंकार से पुण्य पाप को अपने ऊपर लेता है | ज्ञानी जान लेता है कि कर्म देह मन इन्द्रियों से हो रहे हैं, मैं तो असंग साक्षी आकाशवत हूँ | धुएं का दृष्टांत अत्यंत मार्मिक है | दुआं आकाश में तैरता दिखता है ,आकाश को मलिन करता प्रतीत होता है ,पर क्या वह आकाश छू पाता है ? नहीं |वैसे ही ज्ञानीके जीवन में शास्त्र-दृष्टि से पुण्य पाप के कर्म दिख सकते हैं ,पर उस के स्वरूप को वे लिप्त नहीं करते | यह उपदेश अनाचार की छूट नहीं ,बल्कि लिप्तता से मुक्ति का सूत्र है|जब तक कर्तापन है ,तब तक पुण्य भी बंधन है |

श्लोक-आतमैवेदं जगत्सर्व ज्ञानं येन महात्मना | यदृच्छया वर्तमानं तं निशेद्धू क्षमेत क: ||४||

अर्थ- जिस महात्मा ने यह जान लिया कि यह समस्त जगत आत्मा ही है,उस के यदृच्छा से ,स्वाभाविक रूप से होने वाले आचरण को रोकने में कौन समर्थ है |

विवेचना -यह श्लोक ज्ञानी की सहजता और स्वच्छन्दता का उद्घोष है |जब एक जगत को आत्मा से भिन्न देखा जाता है ,तब तक विधि-निषेध ,संयम-असयम का उहापोह रहता है |पर जब एकत्व -बोध हो गया कि जो कुछ है आत्मा ही है ,तब सारा आग्रह गिर जाता है | ज्ञानी का व्यबहार प्रयत्न -जन्य नहीं ,यदृच्छा -प्रवाह है जैसे सूखा पता हवा के संग बहता है मूढ़ जन उसे अपने नैतिक मानदंड से मापता है |पर वे असफल रहते हैं |वह शास्त्र के लिए आचरण नहीं करता ,न शास्त्र के विरूद्ध आचरण करता है | उस का जीवन नदी जैसा हो जाता है,जिस का कोई निश्चित घाट नहीं ,उसे रोकने टोकने का अधिकार किसी को नहीं,क्यों कि वह अब किसी व्यक्ति का नहीं,स्वयं परमात्मा का ही विलास है |

श्लोक-आब्रह्मस्तंबपर्यन्ते भूतग्रामे चतुर्बिधे |विज्ञस्यैव हि सामर्थ्य -मिच्छानिच्छाविसर्जने ||५||

अर्थ- ब्रह्मा से लेकर तिनके तक फैले हुए इस चार प्रकार के प्राणी समूह में,इच्छा और अनिच्छा का त्याग करने का सामर्थ केवल विज्ञानी में ही है |

विवेचना -चार प्रकार के जीव-जरायुज,अण्डज,स्वेदज और उद्भिज्ज -सभी राग द्वेष की डोर से बंधे हैं |देवता भी अमृत की इच्छा और असुरों से अनिच्छा से बंधे हैं |इच्छा और अनिच्छा ही संसार का इंधन है |संसारी इसे दबाता है,पर मिटा नहीं पाता | केवल आत्मज्ञानी ही इसे जड से काट पाता है क्यों कि वह जानता है कि इच्छा पूर्णता से जन्मती है |जब मैं स्वयं पूर्ण हूँ तो क्या चाहूँ और क्या न चाहूँ ? यह त्याग वैराग्य के अभ्यास से नहीं,बोध से फलित होता है |इच्छा का विरोध करने से वह और बलबती होती है ,पर उस के अधिष्ठान को जान लेने से वह स्वत:विलीन हो जाती है |इस लिए ज्ञानी ही सच्चा वीतराग है,वह न किसी को पकड़ता है,न धकेलता है |

श्लोक -आत्मानमद्व्यं कशिचज्जानाति जगदीश्वरम | यद वेति तत्स कुरुते न भय तस्य कुत्रचित ||६||

अर्थ- आत्मा और ईश्वर एक ही है | इन्हें अलग अलग नहीं माना जाना चाहिए |जो आत्मा में ईश्वर के दर्शन करता है उसे कहीं भी भय नहीं रहता | वह निर्भय होता है

विवेचना -यह प्रकरण का सार श्लोक है आत्मा को दो रूप में जाना जा सकता है -एक जड से भिन्न् साक्षी ,दूसरा जगत का अधिष्ठान ईश्वर |जो उसे उद्दय,एक मात्र सता रूप जान लेता है ,वही कृतार्थ है | ऐसे विरले ज्ञानी में जानना और करना अलग नहीं रहते ,अज्ञानी सोचता कुछ है जानता कुछ और है |ज्ञानी में यह खंड नहीं,उस की वेदना ही उस की क्रिया है और जहाँ दूसरा कोई है ही नहीं ,वहां भय कैसा ? भय सदा द्वैत में होता है |जब सर्वत्र अपना ही आत्मा है,तो किस से डरें ? वह सिहंवत विचरता है |उस के लिए कोई लोक ,परलोक ,बिधि,निषेध मृत्यु का भय शेष नहीं रहता | यही अभय पद ही जीवन मुक्ति है |

इति अष्टावक्र चतुर्थ प्रकरण

मदन लाल शर्मा

वेबसाइट-thegodweknow.com

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