माता देवहूति को कपिल का उपदेश

देवहूति का प्रश्न तथा भगवन का भक्ति योग की दिव्य कथा की महिमा का वर्णन

श्रीमद्भागवत महापुराण समस्त वैदिक शास्त्रों का सार है |इस के तृतीय स्कन्ध के पंचविशोSध्याय में वह परम पावन संवाद है,जहाँ स्वयं भगवान विष्णु के अवतार कपिल मुनि अपनी माता देवहूति को आत्म कल्याण का मार्ग बताते हैं |यह अध्याय केवल कथा नहीं बल्कि जीवन के बंधन और मोक्ष का सम्पूर्ण दर्शन है |

पूर्व प्रसंग -विदुर जी को कथा सुनते हुए मैत्रेय मुनि कहते हैं-कर्दम ऋषि परम तपस्वी थे |उन की तपस्या से प्रसन्न हो कर भगवान विष्णु ने वर दिया कि वे स्वयं उन के पुत्र रूप में अवतरित होंगे |कालान्तर में कर्दम मुनि जी का विवाह मनु पुत्री देवहूति से हुआ |गृहस्थ जीवन का पालन करते हुए कर्दम जी ने एक दिव्य विमान का निर्माण किया और देवहूति के साथ अनेक वर्षों तक समस्त भोगों का उपभोग किया |उन्हें नौ कन्याये प्राप्त हुईं ,जिन का विवाह नौ ऋषियों से हुआ |

अंत में स्वयं भगवान कपिल के रूप में अवतरित हुए |पुत्र प्राप्ति के पश्चात कर्दम मुनि ने सन्यास लेने का निश्चय किया |जब वे वन जाने लगे ,तब माता देवहूति ने अत्यंत व्याकुल हो कर कहा – हे नाथ ,आप तो जा रहे हैं ,मेरी पुत्रियों का विवाह हो गया ,अब इस संसार सागर में मेरा उद्धार कौन करेगा ? मुझे इस माया के बंधन और जन्म-मृत्यु के चक्र से कौन छुडायेगा ?

कर्दम जी ने कहा -देवी,चिता मत करो|साक्षात भगवान विष्णु तुम्हारे पुत्र के रूप में आये हैं |यही तुम्हें तत्व-ज्ञान प्रदान करेंगे | इतना कह कर कर्दम जी वन चले गए और भक्ति द्वारा शीघ्र ही भगवान को प्राप्त किया |

माता देवहूति का वैराग्य और जिज्ञासा

पति के चले जाने के बाद बिंदु सरोवर के आश्रम में माता देवहूति पुत्र कपिल के साथ रहने लगी |समय बीतने पर उन के मन में तीव्र वैराग्य उत्पन्न हुआ | उन्होंने देखा कि शरीर ,यह गृह ,यह सब भोग क्षणभंगुर हैं |एक दिन तत्व समूह के पारदर्शी भगवान कपिल कर्म कलाप से निवृत हो कर आसन पर विराजमान थे | उस समय ब्रह्मा जी के बचनों का स्मरण कर के देवहूति ने उन से कहा | हे प्रभु ,इन दुष्ट इन्द्रियों की बिषय वासना से मैं ऊब गयी हूँ और इन की इच्छा पूरी करते रहने से ही घौंर अज्ञानान्धकार में पड़ी हुई हूँ |अब आप की कृपा से मेरी जन्म परम्परा समाप्त हो चुकी है ,इसी से इस दुस्तर अज्ञानान्धकार से पार लगाने के लिए सुन्दर नेत्र रूप आप प्राप्त हुए हैं |आप सम्पूर्ण जीवों के स्वामी भगवान आदि पुरुष हैं तथा अज्ञानान्धकार से अंधे पुरुषों के लिए नेत्र स्वरूप सूर्य की भान्ति उदित हुए हैं | देव,इन देह गेह आदि में जो मैं -मेरेपन का दुराग्रह होता है ,वह भी आप का ही कराया हुआ है ,अत: अब आप मेरे इस महामोह को दूर कीजिये |आप अपने भक्तों के संसार रूप वृक्ष के लिए कुठार के समान हैं,मैं प्रकृति और पुरुष का ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा से आप शरणागत वत्सल की शरण आयी हूँ | आप भागवत धर्म जानने वालों में सर्व श्रेष्ठ हैं,मैं आप को प्रणाम करती हूँ |

हे कपिल,महात्मा लोग कहते हैं कि मोक्ष ही मनुष्य जीवन का परम पुरुषार्थ है | यह मोक्ष कैसे प्राप्त होता है ?पुरुष और प्रकृति का क्या स्वरूप है ?मै स्त्री हूँ,मंद बुद्धि हूँ,पर आप मेरे पुत्र ही नहीं ,मेरे गुरु भी हैं | कृपया मुझे सरल मार्ग बताइए ,जिस से मैं इस भव -बंधन से छूट जाऊं |

माता की ऐसी करुण पुकार ,करुणा के सागर भगवान् कपिल का हृदय द्रवित हो गया |भगवान कपिल ने कहा -माता ,यह मेरा निश्चय है कि अध्यात्म योग ही मनुष्यों के कल्याण का मुख्य साधन है ,जहाँ दुःख और सुख सर्वथा निवृत हो जाती है |साधुओं के लिए मोक्ष का मार्ग तो पहले से ही शास्त्रों में कहा गया है | वही मार्ग मैं तुम्हें भी बताता हूँ|मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण उस का अपना मन ही है |

मन एव मनुष्याणा कारण वन्धमोक्षयो: | वन्धाय बिषया संगि मुक्त्यै निर्विषय मन: ||

अर्थात मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण बनता है और जब वही मन विषयों से विरक्त हो कर परमात्मा में लग जाता है ,तो मोक्ष का कारण बन जाता है | जिस समय यह मन मैं और मेरेपन के कारण होने वाले काम -क्रोध आदि विकारों से मुक्त एवं शुद्ध हो आता है ,उस समय वह सुख दुःख से छूट कर सम अवस्था में आ जाता है | तब जीव अपने ज्ञान -वैराग्य और भक्ति से युक्त हृदय से आत्मा को प्रकृति से परे एक मात्र ,भेद रहित ,स्वयं प्रकाश ,सूक्ष्म ,अखंड और उदासीन (सुख दुःख शून्य) देखता है तथा प्रकृति को शक्तिहीन अनुभव करता है |विवेकी जन संग या आसक्ति को ही आत्मा का न छूटने वाला बंधन मानते हैं ,किन्तु वही संग या आसक्ति जब संतों -महापुरुषों के प्रति हो जाती है ,तो मोक्ष का खुला द्वार बन जाती है |

हे माता ,मेरे मत में आत्म साक्षात्कार के लिए योग ही परम कारण है ,और वह योग है -भक्ति योग,सांख्य ,अष्टांग योग,तप,यज्ञ सब अपनी जगह ठीक हैं ,परन्तु भक्ति के बिना वे पूर्व फल नहीं देते |जैसे अग्नि में तपाने से सोने का मेल कट जाता है ,वैसे ही मेरी भक्ति से मन का मेल धुल जाता है | भक्ति दो प्रकार की होती है -सकाम और निष्काम | जो भक्ति धन,पुत्र,,यश अथवा स्वर्ग की कामना से की जाती है ,वह सकाम होती है और वह भी पवित्र करने वाली है,परन्तु जो भक्ति बिना किसी कामना के ,केवल मेरी प्रसन्नता के लिए की जाती है ,वह निर्गुण और परम श्रेष्ठ है ,ऐसी भक्ति से मेरा धाम प्राप्त होता है |

भक्त के लक्षण और भक्ति के साधन :- कपिल आगे कहते हैं -हे माता मेरे भक्त कैसे होते हैं सुनो –

जो लोग सहनशील ,दयालु,समस्त देहधारियों के अकारण हित,किसी के प्रति भी शत्रु भाव नहीं रखते हैं ,शांत ,सरल स्वभाव और सत्पुरुषों का सम्मान करने वाले होते हैं जो मुझ में अनन्य भाव से सुद्दढ प्रेम करते हैं ,मेरे लिए सम्पूर्ण कर्म तथा अपने सगे-सम्बन्धियों को भी त्याग देते हैं ,और मेरे परायण रह कर मेरी पवित्र कथाओं का श्रवण ,कीर्तन करते हैं तथा मुझ में ही चित लगाये रहते हैं – | इस के अतिरिक्त १. वे सब प्राणियों में समदृष्टि रखते हैं,किसी से वैर नहीं करते | 2.वे करुणा,मैत्री और सहिष्णुता के मूर्तिमान रूप होते हैं | 3. वे किसी भी जीव को कष्ट नहीं पहुंचाते | ४. वे मेरे गुणों का श्रवण,कीर्तन और स्मरण निरन्तर करते हैं | वे मेरे लिए ही समस्त कर्म करते हैं और फल मुझे अर्पित कर देते हैं| उन भक्तों को संसार के तरह तरह के ताप कोई कष्ट नहीं पहुंचाते |ऐसे ऐसे सर्व संग परित्यागी महापुरुष ही साधू होते हैं ,उन्हीं का संग करना चाहिए ,उसी से मुक्ति मिलती है | सत्संग से ही विषयों के प्रति वैराग्य उत्पन्न होता है ,और वैराग्य से ही भक्ति द्दढ होती है |

भक्ति के साधन -मेरी कथा सुनने ,मेरे नामों का जप करना,मेरी मूर्ती की पूजा करना,मेरे भक्तों की सेवा करना,सब प्राणियों में मुझ को देखना ,मन और वाणी को मेरे में लगाना | हे माता,जो मनुष्य इन साधनों को अपनाता है ,उस का मन शीघ्र ही शुद्ध हो कर मुझ में लीन हो जाता है |

सांख्य दर्शन – पुरुष और प्रकृति का विवेक

हे जननी ,अब मैं तुम्हें सांख्य का गूढ़ रहस्य बताता हूँ |इस सम्पूर्ण जगत का मूल कारण प्रकृति है |यह प्रकृति त्रिगुणमयि है -सत्व,रज और तम |जब काल की प्रेरणा से इन गुणों में विषमता आती है ,तभी सृष्टि की रचना होती है | प्रकृति जड है और पुरुष अर्थात जीवात्मा चेतन है | पुरुष प्रकृति के गुणों में आसक्त हो कर स्वयं को कर्ता भोक्ता मान लेता है ,यही उस के बंधन का कारण है | वास्तव में आत्मा न कुछ करता है,न भोगता है | वह तो केवल साक्षी ,निर्विकार और आनंद स्वरूप है | करने भोगने वाली तो प्रकृति है |

जैसे सूर्य जल में प्रतिबिम्बित होने पर हिलता डुलता सा प्रतीत होता है ,परन्तु वास्तव में वह अचल रहता है ,वैसे ही आत्मा प्रकृति के संग से संसारी प्रतीत होता है | जब योग और भक्ति के द्वारा आत्मा को यह विवेक हो जाता है कि” मैं प्रकृति से भिन्न हूँ” तब वह मुक्त हो जाता है | यही सांख्य का परम सिधान्त है |

उपसंहार -आज के मानव के लिए संदेश

माता देवहूति ने इस उपदेश को सुन कर भगवन कपिल की परिक्रमा की और ध्यान में लीन हो गई | कालान्तर में इसी ज्ञान के द्वारा उन्होंने परम सिद्धि प्राप्त की और उन का शरीर भी सिद्ध हो गया | वह स्थान आज भी सिद्ध पुर नाम से प्रसिद्ध है |

तृतीय स्कन्ध के इस पच्चीसवे अध्याय का संदेश आज के भौतिक वादी युग में और भी अधिक प्रासंगिक है | आज मनुष्य ने बाहर की दुनिया में वहुत उन्नति कर ली है ,परन्तु भीतर का मन अशांत है |भगवान कपिल का यह सूत्र-मन ही बंधन और मोक्ष का कारण का कारण है -हमें बताता है कि शान्ति बाजार में नहीं अपने मन को साधने में है |

यदि हम निश्काम भक्ति,,सत्संग और आत्म विवेक को जीवन में धारण करें,तो गृहस्थ में रहते हुए भी ह्म् मुक्ति को प्राप्त कर सकते हैं | यही देवहूति कपिल संवाद का शाश्वत प्रकाश है,जो अनादि काल से मानवता को अन्धकार से प्रकाश की और ले जा रहा है |

इति श्रीमद्भागवते महापुराण पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे कापिलेयोपाख्याने पंचविशोSध्याय:|| 25||

मदन लाल शर्मा

वेबसाइट – http://thegodweknow.com – अगले सोम मंगल वार २६स्वेन अध्याय में भिन्न भिन्न तत्वों की उत्पति का वर्णन |

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