श्रीमद्भागवत स्कन्ध:तृतीय:तृतीयोSध्याय:

धृतराष्ट्र के महलों में जब अन्धकार छा गया था,जब कौरवों का अहंकार हस्तिनापुर की गलियों में विष घोल रहा था ,ठीक उसी समय विदुर जी ने सत्य का साथ दिया और दुर्योधन के दुर्व्यबहार से आहत हो कर तीर्थ यात्रा पर निकल पड़े |यमुना के तट पर हरिद्वार से प्रयास तक भ्रमण करते हुए ,उन के हृदय में एक ही प्यास थी-श्रीकृष्ण कथा सुनने की .|

इसी बीच यमुना के पावन तट पर एक दिव्य मिलन हुआ | सामने से आ रहे थे उद्दव जी -वही उद्दव जो श्रीकृष्ण के परम सखा,मंत्री और शिष्य थे |उन के मुख से वैराग्य की आभा थी ,पर नेत्रों में वियोग का सागर हिलोरें ले रहा था | विदुर जी ने उन्हें देखते ही पहचान लिया |दोनों महापुरुष एक दूसरे के गले लगे | वर्षों का विछोह एक क्षण में गल गया |

विदुर जी ने व्याकुल हो कर पूछा -” हे उद्दव ,हमारे प्राण धन श्रीकृष्ण कुशल से तो हैं न ?यादव वंश,बसुदेव ,बलराम भैया,अर्जुन और द्वारका की प्रजा सब आनन्द में हैं न ? यह प्रश्न सुनते ही ,उद्दव जी का कंठ भर आया ,कुछ क्षण वे मौन रहे फिर गहरी सांस ले कर बोले -” हे विदुर जी आप ने जिन का नाम लिया ,अब वे इस धरती पर नहीं रहे “| विदुर जी स्तब्ध रह गए ,क्या कह रहे हो उद्दव ?

उद्दव जी ने नेत्र बंद किए और बोले”हाँ तात ,भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी लीला समेत ली | जिस दिन उन्होंने इस लोक से प्रस्थान किया,उसी दिन् धर्म ,सत्य,धैर्य और श्री ने भी पृथ्वी को छोड़ दिया और कलियुग ने उसी क्षण प्रवेश लिया “|यह सुन कर विदुर जी धरती पर बैठ गए |उद्दव जी ने उन्हें संभाला और फिर श्रीकृष्ण की अंतिम लीलाओं का वर्णन करने लगे |

द्वारका की अंतिम झांकी –

उद्दव जी बोले “विदुर जी प्रभु ने जब देखा कि पृथ्वी का भार उतर चुका है ,कंस,जरासंध,शिशुपाल जैसे असुर मारे जा चुके हैं,धर्म की स्थापना हो चुकी है ,तो उन्होंने सोचा कि अब यादव वंश भी यदि रहेगा तो पृथ्वी पर फिर से भार हो जाएगा |यादवों में बल का अहंकार बढ़ रहा था | एक दिन ऋषि विश्वमित्र ,आसीत,कण्व आदि द्वारका पधारे | यादव कुमार ने परिहास में साँव को स्त्री वेश में सजा कर पूछा-महाराज ,यह गर्भवती स्त्री क्या जनेगी ?ऋषियों ने योग दृष्टि से सब जान लिया और क्रोध में शाप दिया,”यह एक मूसल को जन्म, देगा ,जो तुम्हारे सारे कुल का नाश कर देगा “|

शाप सुनते ही यादव काँप उठे | समय पर साँव के पेट से लोहे का मूसल निकला | उग्रसेन ने उसे चूर चूर करवा कर समुद्र में फिंकवा दिया ,पर होनी प्रबल थी ,समुद्र ने उस चूरे को किनारे फेंक दिया और वहां एरक नाम की घास उग आई | बचे हुए लोहे के टुकड़े को एक मछली निगल गई |मछुआरे ने मछली पकड़ी,लोहे का टुकड़ा एक व्याध को दे दिया ,उस ने उस से अपने बाण की नोक बना ली |

प्रयास क्षेत्र में यदुवंश का संहार –

कुछ समय बाद भगवान ने लीला रची,उन्होंने यादवों को प्रयास क्षेत्र तीर्थ यात्रा के लिए भेजा | वहां मदिरा पान के बाद यादव आपस में लड़ने लगे ,क्रोध में उन्होंने वही एरक घास उखाड़ी और देखते ही देखते वह घास वज्र जैसी मूसल में बदल गई | भाई भाई ,पिता पुत्र सब एक दूसरे को मारने लगे ,देखते ही देखते पूरा यदुवंश समुद्र की लहरों की तरह शांत हो गया |

बलराम जी ने योग साधना से समुद्र तट पर देह त्याग दी,उन के मुख से शेषनाग प्रकट हो कर समुद्र में समा गए |

श्रीकृष्ण का महाप्रयाण –

उद्दव जी की बाणी कांपने लगी बोले “मैं तब प्रभु के साथ वन में था | वे एक पीपल के वृक्ष के नीचे वाएं पैर पर दायाँ पैर रख कर लेटे थे | उन का तलवा कमल पंखुड़ी सा लाल था | उसी समय जरा नाम का व्याध वहां आया ,दूर से उसने चमकते तलवे को मृग का मुख समझा और विष बुझा बाण चला दिया ,बाण प्रभु के तलवे में लगा |”

व्याध दौड़ कर पास आया तो देख कर काँप गया -साक्षात चतुर्भुज भगवान ,वह चरणों में गिर पड़ा \ प्रभु ने उसे अभय दिया मुस्कराय और् कहा -“हे जरा ,तू मेरा पुराना भक्त है ,त्रेता में तू बाली था तब मैंने तुझे छिप कर बाण मारा था ,आज तेरा बाण मुझे लगा , कर्म का चक्र पूरा हुआ | जा तू मेरे धाम को जायेगा |”

यह कह कर भगवान ने अपनी दृष्टि से मुझे निहारा ,बोले “उद्दव अब तू बद्रिकाश्रम जा ,वहां नर नारायण की तपोभूमि में भक्ति योग का साधन कर ,मैं जा रहा हूँ |”इतना कहते ही प्रभु ने अपनी लीला समेट ली ,न कोई रथ आया न कोई विमान ,वे अपने धाम में ऐसे ही लीन हो गए ,जैसे सूर्य अस्त हो जाता है ,आकाश में दुदुभियाँ बजीं देवताओं ने पुष्प बरसाए |

उद्दव-विदुर संवाद –

उद्दव जी रोते रोते बोले-” विदुर जी ,मैं उस दिन से जल रहा हूँ ,पर जाते जाते प्रभु ने मुझे ज्ञान दिया उन्होंने कहा -उद्दव संसार दुखालय है ,इस में आसक्ति मत रखना ,सब को मेरा ही रूप जान कर भक्ति करना मैं सब के हृदय में बैठा हूँ |”

विदुर जी की आँखों से अविरल अश्रु धारा बह रही थी ,उन्होंने कहा -” धन्य हो उद्दव ,तुम ने तो साक्षात भगवान के मुख से ज्ञान सुना | अब तुम मुझे भी वही श्रीकृष्ण कथा सुनाओ ,जिस से मेरा जन्म भी सफल हो जाए |”

उद्दव जी ने कहा-” हे,विदुर भगवान की लीला अनन्त है ,उन के जन्म से लेकर महाप्रयाण तक का एक एक क्षण रसमय है ,मथुरा में कंस वध ,वृन्दावन में गोपियों का प्रेम ,गौवर्धन धारण,कालिया नाग नाथना ,रास लीला ,कुरुक्षेत्र में गीता उपदेश सब अलौकिक है | जो उन्हें जान लेता है ,वह फिर कभी जन्म मरण के चक्र में नहीं आता |

यमुना का जल कल कल वह रहा था | दो महान भक्त वहीं तट पर बैठ कर श्रीकृष्ण स्मरण में डूब गए |सूर्य ढल रहा था ,पर उन के हृदय में श्रीकृष्ण रूप उदय हो चूका था |

कथा का सार –

विदुर जी ने हाथ जोड़ कर कहा-“उद्दव आज समझ आया कि भगवान क्यों अवतार लेते हैं -धर्म की स्थापना ,भगतों के उद्धार और अपनी प्रेम माधुरी बांटने के लिए | उन का जाना भी लीला है ,रहना भी लीला है |” जो इस कथा को सुनता है ,उस के हृदय का कलि मल धुल जाता है |

इस प्रकार तृतीय स्कन्ध के तृतीय अध्याय में श्रीकृष्ण के महाप्रयाण ,यदुवंश संहार और उद्दव विदुर के दिव्य मिलन का वर्णन हुआ | यह अध्याय हमें सिखाता है कि संसार नश्वर है पर भगवान की कथा अमर है | जो इस कथा को प्रेम से गाता ,सुनता है भगवान उस के हृदय में सदा निवास करते हैं |

बोलो भक्त वत्सल भगवान श्रीकृष्ण की जय ,उद्दव विदुर संबाद की जय | श्रीमद्भागवत पुराण की जय |

लेखक-मदन लाल शर्मा

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