श्रीमद्भागवत पुराण :तृतीय: स्कन्ध:षष्ठोSध्याय
विराट पुरुष की उत्पति –
प्राचीन काल की बात है ,जब सृष्टि का आरम्भ भी नहीं हुआ था ,तब केवल एक ही तत्व बिद्यमान था -पर ब्रह्म नारायण | न दिन था न रात न आकाश न पृथ्वी | केवल कारण-सलिल अर्थात जल का अनन्त सागर लहरा रहा था और उस जल पर योगनिन्द्रा में लीन थे भगवान विष्णु |
मैत्रेय ऋषि ने विदुर को यह कथा सुनाते कहा -” हे विदुर ,जब भगवान ने सृष्टि रचने का संकल्प किया,तब उन की नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ | उसी कमल से ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए ,चारों और देख कर ब्रह्मा जी चकित हो गए | उन्हें न दिशा का ज्ञान था ,न अपना कर्तव्य समझ आ रहा था | तब उन्होंने तप किया | तप के बल से भगवान ने उन्हें वेद ज्ञान दिया और सृष्टि रचने का आदेश दिया” |
ब्रह्मा जी ने सृष्टि रचना प्रारम्भ की,परन्तु उन के मानस से उत्पन्न सनकादिकुमारों ने सृष्टि में रुचि नहीं दिखाई ,वे तो बाल ब्रह्मचारी बनकर भगवान के भजन में लग गए | तब ब्रह्मा जी के मन में क्रोध उत्पन्न हुआ| क्रोध से उन के भौंहों के मध्य से नील-लोहित रूद्र प्रकट हुए| रूद्र ने ब्रह्मा जी से स्थान और नाम माँगा | ब्रह्मा जी ने उन्हें ग्यारह नाम और ग्यारह स्थान दिये और कहा -“तुम प्रजा उत्पन्न करो ” रूद्र ने तुरंत भूत,प्रेत,पिशाचों की सृष्टि कर दी| वह तामसी सृष्टि देख कर ब्रह्मा जी ने रूद्र को तप करने को कहा |
इस के बाद ब्रह्मा जी ने अपने दस मानस पुत्र उत्पन्न किये ,मरीचि,अत्री,अंगीरा,पुलस्त्य,पुलह,क्रतु,भृगु,वशिष्ठ,दक्ष,और नारद इन के साथ धर्म ,संकल्प,रुचि, श्रद्धा आदि भी उत्पन्न हुए |परन्तु सृष्टि का विस्तार फिर भी न हो पाया | तब ब्रह्मा जी ने विचार किया कि जब तक स्त्री पुरुष का भेद नहीं होगा ,सृष्टि आगे नहीं बढ़ेगी |उसी क्षण उन के शरीर के दो भाग हो गए ,दहिने भाग से पुरुष”मनु” और वाएं भाग से स्त्री “शतरूपा” प्रकट हुई | मनु और शतरूपा ने बिवाह किया और मानव सृष्टि का प्रारम्भ हुआ | किन्तु ब्रह्मा जी को लगा कि केवल इतने से सृष्टि पूर्ण नहीं होगी | उन्हें विराट पुरुष का स्मरण आया | यह विराट पुरुष कौन है? मेत्रेय जी कहते हैं |
जब भगवान ने सृष्टि का संकल्प किया ,तब उन की शक्ति से महतत्व उत्पन्न हुआ | महतत्व से अहंकार,अहंकार से पंचतन्मात्रा और पंचतन्मात्रा से पंच महाभूत प्रकट हुए | इन तत्वीं ने जब आपस में मिल कर ब्रम्हाण्ड का रूप नहीं लिया ,तब भगवान स्वयं उस में प्रविष्ट हुए| भगवान के प्रवेश करते ही ये सब तत्व चेतन हो उठे और एक विराट पुरुष का आकार बन गया |
यह विराट पुरुष हजारों सिर,हजारों नेत्र ,हजारों पैर वाला था | सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उसी के शरीर में समा गया |: उस के मुख से ब्राह्मण,भुजाओं से क्षत्रिय,जंघाओं से वैश्य और चरणों से शूद्र उत्पन्न हुए | चन्द्रमा मन से ,सूर्य नेत्र से,इंद्र और अग्नि मुख से ,वायु प्राण से , आकाश नाभि से ,स्वर्ग सिर से ,पृथ्वी पैर से और दिशाएँ कान से प्रकट हुई | इस प्रकार विराट पुरुष ही समस्त देवता,ऋषि,मनुष्य,पशु पक्षी और चर -अचर सृष्टि का आधार बना |वह विराट परुष कोई और नहीं,स्वयं श्री हरि का ही विराट रूप है |
विदुर जी ने प्रश्न किया ,”हे मुनि,यदि भगवान निर्गुण हैं,तो वे विराट रूप कैसे धारण करते हैं ?”मैत्रेय जी मुस्कराये और बोले -” विदुर जी ,जैसे सूर्य एक है परन्तु अनेक घड़ों के जल में अनेक दिखाई देता है ,वैसे ही भगवान एक होते हुए भी अपनी माया से अनेक रूप् धारण करते हैं | सृष्टि के लिए वे विराट रूप लेते हैं ,पालन के लिए चतुर्भुज विष्णु रूप और संहार के लिए रूद्र रूप | वास्तव में वे इन से परे हैं |”
ब्रह्मा जी ने उस विराट पुरुष की स्तुति की और उस से प्रार्थना की कि वह सृष्टि कार्य में सहायक हों | विराट पुरुष के शरीर में ही चौदह भुवन स्थित हो गए -सात ऊर्ध्व लोक और सात अधो लोक ,उस के रोम रोम मे अनन्त ब्रम्हांड समाए हुए हैं |
इस कथा का मर्म समझाते हुए मैत्रेय जी कहते हैं -“जो मनुष्य प्रात:काल उठ कर विराट पुरुष की इस उत्पति की कथा सुनता या पढ़ता है ,उस की बुद्धि निर्मल हो जाती है |वह समझ जाता है कि यह सम्पूर्ण जगत भगवान का ही शरीर है | तब उस के मन में द्वेष ,अहंकार और भेद बुद्धि नष्ट हो जाती है | वह सब में भगवान् को देखता है |” विदुर जी ने हाथ जोड़ कर कहा ,”धन्य है आप की वाणी मुनिवर ,आज मैंने जाना कि हम सब उस विराट पुरुष के ही अंश हैं | ब्राह्मण मुख हैं तो शूद्र उस के चरण न कोई ऊँचा है न कोई नीच , सभी उसी के अंश हैं|”
मैत्रेय जी ने आशीर्वाद दिया -” यही भागवत का सार है विदुर जी “| जो इस रहस्य को जान लेता है ,वह कभी किसी से घृणा नहीं करता | वह जानता है कि जिस को वह ठोकर मार रहा है ,वह भी उसी विराट के चरण हैं और जिस को वह प्रणाम कर रहा है वह भी उसी का मुख है |
इस प्रकार तृतीय स्कन्ध के छठे अध्याय में विराट पुरुष की उत्पति और उस के द्वारा सृष्टि रचना का दिव्य वर्णन हुआ है | यह कथा हमें सिखाती है कि सम्पूर्ण ब्रम्हांड एक परिवार है ,एक शरीर है | इस में भेद देखना अज्ञान है और एकता देखना भी भक्ति है | जो भक्त इस कथा का श्रद्धा से श्रवण करता है ,उसे भगवान की विराट सता का बोध होता है | उस का हृदय विशाल हो जाता है और वह ” वसुधैव कुटुम्भकम ” के भाव में स्थित हो जाता है | यही श्रीमद्भागवत का उद्देश्य है -जीव को ईश्वर की विराटता से जोड़ देना |
|| इति श्रीमद्भागवते महापुराणे तृतीय स्कन्धे षष्ठोSध्याय ||
लेखक-मदन लाल शर्मा
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